शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
Page 160 of 208
Read in contextचौबीसवीं कथा : मे देवक नामक पुरूष आश्रय है। धनिक की पत्नी सज्जनी आलम्बन। सज्जनी को देखकर देवक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। देवक का सज्जनी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष, आदि व्यभिचारीभाव हैं।
छब्बीसवीं कथा : में देवसाख्य ग्रामाध्यक्ष और पुत्र धवल आश्रय है। क्षेमराज की पत्नी रत्नादेवी आलम्बन है। रत्नादेवी को देखकर उन दोनो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। उन दोनों का रत्नादेवी के घर जाना और सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
सत्ताईसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मोहिनी आश्रय है। कुमुख नामक धूर्त आलम्बन है। कुमुख को देखकर मोहिनी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहिनी का कुमुख के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
अट्ठाईसवीं कथा : मे प्रभाकर नामक ब्राह्मण आश्रय है। जरसाख्य की पत्नी देविका पुंश्चली आलम्बन है। देविका को देखकर प्रभाकर के हृदय में कामभावना जागृत होती है। प्रभाकर का देविका के साथ से सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।
उन्तीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी सुन्दरी आश्रय है। मोहन नामक उपपति आलम्बन है। मोहन को देखकर सुन्दरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहन का सुन्दरी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव हैं। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।
इकतीसवीं कथा : में वीर रस का वर्णन प्राप्त होता है खरगोश आश्रय है ,पिङ्गल नामक सिंह आलम्बन है। खरगोश का सिंह के पास जाना, सिंह को कुयें में उसकी परछाई दिखाना आदि अनुभाव है। श्रय, धृति, चपलता, आवेश आदि व्यभिचारीभाव हैं।
[ 150 ]