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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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बत्तीसर्वीं कथा : में सोहड़ की पत्नी राजिनी आश्रय है। संकेत किया गया उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर राजिनी के हृदय में कामभावना जागृत होती है राजिनी का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चौतीसर्वीं कथा : में शम्भु नामक विप्र आश्रय है। खेती की रखवाली करने वाली सुन्दर बालिका आलम्बन। बालिका को देखकर शम्भु के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्भु का बालिका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

पैंतीसवी कथा : मे शम्बक नामक वणिक् आश्रय है। बर्तन बेचने वाले बनिया की पत्नी आलम्बन । वणिक् पत्नी को देखकर शम्बक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्बक का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सैंतीसर्वीं कथा : में सूरपति की पुत्री सुभगा आश्रय है। पूर्णपाल नामक हलवाला आलम्बन। पूर्णपाल को देखकर सुभगा के हृदय में कामभावना जागृत होती है। सुभगा का हलवाहे के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

अड़तीसर्वीं कथा : मे प्रियंवद नामक विप्र आश्रय है। वणिक् पत्नी पुँश्चली आलम्बन। पुँश्चली को देखकर ब्राह्मण के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। प्रियंवद का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

चालीसर्वीं कथा . मे कुबुद्धि आश्रय है सुबुद्धि की पत्नी आलम्बन। सुबुद्धि की पत्नी को देखकर कुबुद्धि के हृदय में कामभावना जागृत होती है। कुबुद्धि का मित्र की पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारभाव हैं।


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