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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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की है। शुकसप्तति में कहीं भी कठिन प्रकार के अलंङ्कारों का प्रयोग नहीं हुआ है। उपमा, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास, मालादीपक, निर्दशना, प्रतिवस्तूपमा आदि सरल प्रवृत्ति के अलंङ्कारों का वर्णन मिलता हैं।

उपमा का लक्षण -

साधर्म्यमुपमा भेदे ।¹

उपमान तथा उपमेय का भेद होने पर उनके साधर्म्यका वर्णन उपमा कहलाता है।

शुकसप्तति में उपमा :

शुकसप्तति में यूँ तो उपमा का प्रयोग पग-पग पर हुआ है। सामान्य से सामान्य बात को भी व्यक्त करने के लिए कवि ने उपमा का आश्रय लिया है किन्तु उन कथनो में उपमा का कोई विशेष सौन्दर्य लक्षित नही होता है। अतएव कुछ विशेष उदाहरण दिये जा रहे हैं जिनमें यत्किंच्यत् उपमा का सौन्दर्य दर्शनीय है–

भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः ।
दुःखोसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव ।²

भोगी (1. भोग भोगने वाले, 2- फणवाले), कञ्चुक (1. कवच 2. केचुल) से आवृत्त, क्रूर, कुटिलगामी (1. कुटिलतापूर्वक व्यवहार करने वाले 2. टेढ़े चलने वाले) राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय (अनुकूल) होते हैं।

गच्छ देवि न ते दोषो गच्छन्त्याः परवेश्मनि ।
यदि काचिच्छरीरे ते बुद्धिः सर्षपचौरवत् ।³

देवि जाओ। पराये घर जाने में तुम्हें दोष नहीं लगेगा किन्तु यदि तुममें उस सरसों चुराने वाले के समान बुद्धि हो।


¹ काव्य प्रकाश दशम् उल्लास, सूत्र स० 124, पृष्ठ स० 443
² शुकसप्तति, श्लोक सं० 35, पृष्ठ सं० 33
³ शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 115 पृष्ठ स० 97

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