शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextशशिना हरिणा चैव बलिना कुशभूभुजा।
कुशशक्तिच्छलत्यागसम्पद्यस्य न खण्डयते।¹
चन्द्रमा, विष्णु, बलि और राजा कुश क्रमश. जिसकी शीतलता, छल,त्याग और सम्पत्ति को खण्डित नहीं करते अर्थात् शीतलता में वह चन्द्रमा के समान, छल में विष्णु के समान, त्याग में बलि के समान और सम्पत्ति में राजा कुश के समान था।
प्राचीमुखे विभातीन्दुरुदयाद्रिशिरः स्थितः।
द्वीपस्त्रिभुवनस्येव प्रच्छन्नस्य तमिस्त्रया।²
पूर्व दिशा मे उदयाचल के अग्रभाग पर स्थित चन्द्रमा अन्धकाराच्छन्न त्रिभुवन का दीप सा शोभित हो रहा है।
कहीं-कहीं पात्रों के गुणों का वर्णन करने के लिए कावे ने उपमा का सहारा लिया है जैसे-
किं तस्य वर्ण्यते राज्ञः प्रजापालनशालिनः।
यस्मिंल्लोके न दृष्टा हि दोषा रविकरैरिव।³
उस प्रजापालक राजा का क्या वर्णन करें? जिसके लोक में शासन करते समय दोष नही दिखाये देते, जैसे सूर्य-किरणो से रात लुप्त हो जाती है।
व्रज देवि न तेऽयुक्तं ब्रजनं गजगामिनी।
व्याघ्रमारीव बुद्धिस्ते द्वितीयापि यदि स्थिरा।।⁴
गजगामिनी! यदि व्याघ्रमारी की द्वितीय बुद्धि की भाँति तुम्हारी भी बुद्धि स्थिर हो तो जाओ, तुम्हारा जाना अनुचित नहीं है।
1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 138 पृष्ठ स० 116
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 146 पृष्ठ सं० 119
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 139 पृष्ठ स० 116
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 212 पृष्ठ स० 182
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