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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः नगण, नगण मगण, यगण तथा यगण आये, साथ ही साथ भोगी अर्थात् नाग (8) तथा लोक (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो, उसे मालिनी कहते हैं।

सुवृत्त-तिलक मे मालिनी छन्द का इस प्रकार वर्णन किया गया है–

कुर्यात्सर्गस्य पर्यन्ते मालिनी द्रुततालवत्।

सर्ग के अन्त में द्रुतताल के समान मालिनी छन्द का प्रयोग करना चाहिये। महाकाव्यों मे सर्ग के अन्त में छन्द परिवर्तन करने का नियम है। सर्ग की समाप्ति में जब कवि को किसी कथा को अथवा प्रसङ्ग को शीघ्रता से समाप्त करना होता है तब मालिनी छन्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है।

शुकसप्तति कथा काव्य होने के कारण इसमें सर्ग नहीं प्राप्त होते हैं। अतः कवि ने मालिनी के स्वरूप का पालन करते हुये इस छन्द का प्रयोग कहीं-कहीं कथा के मध्य और कहीं-कही कथा के अन्त में किया है।

जैसे–

उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना–
ममृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः
भवति विकलमूर्तिर्मण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम्।।¹

मालिनी छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि तेजस्वी से तेजस्वी व्यक्ति भी दूसरे के घर जाकर लघुता को प्राप्त करता है अर्थात् उसका तेज घट जाता है।

वंशस्थ- (प्रत्येक चरण में बारह अक्षर)

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।²


¹ शुकसप्ततिः, श्लोक स० 307 पृष्ठ स० 257
² वृत्तरत्नाकर, 3/46

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