शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextवीर एवं रौद्र रस के मेल में वसन्ततिलका छन्द उपयुक्त माना गया है किन्तु शुकसप्तति में स्त्रियों के स्वभाव, कथन उनके आचरण, साधुपुरूषों के आचरण इत्यादि का कथन करने के प्रसङ्ग में कवि ने इस छन्द का प्रयोग किया है। जैसे-
अद्यापि नोज्झति हरः किल कालकूटं,
कूर्मी बिभर्ति धरणीं खलु चात्मपृष्ठे।
अम्भोनिधिर्वहति दुःसहवाडवाग्नि-
मङ्गीकृतं सुकृतिन. परिपालयन्ति।¹
वसन्तलिका छन्द के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि महान पुरुष अपना सर्वस्व बलिदान करके भी दिये गये वचन का परिपालन करते हैं।
चिन्तामिमां वहषि किं गजयूथनाथ
यूथाद्वियोगविनिमीलितनेत्रयुग्म।
पिण्डं गृहाण पिब वारि यथोपनीतं
दैवाद्भवन्ति विपदः किल सम्यदो वा।
इस छन्द के माध्यम से यह उपदेश दिया गया है कि मनुष्य को हर स्थिति में धैर्य धारण करना चाहिये और जो कुछ भी दैवकृपा से प्राप्त हो रहा हो उसी में संतोष रखना चाहिए। सुख-दुःख तो भाग्यवश आते ही रहते हैं।
संमोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति।
एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणा
किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।²
इस छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि किस प्रकार से कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ दयालु हृदय पुरुषों के साथ कौन-कौन से व्यवहार करती हैं।
1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 13, पृष्ठ सं० 12
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 275-276
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