शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextव्यक्त किए भाव को पशु भी ग्रहण कर लेता है। घोडे–हाथी संकेत द्वारा प्रेरित हो (मनुष्य अथवा भार को) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाते हैं पडित बिना कहे भाव को तर्क द्वारा जान लेता है क्योकि दूसरो के संकेतित अभिप्राय को जानना ही बुद्धि का फल है।¹
नीच व्यक्ति के ससर्ग से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। क्योंकि दुष्ट अत्यन्तप्रिय के विषय में भी अपना विकार ही दिखाता है।²
मन से विपरीत किए गये को जो सह सकता है और अर्थ त्याग कर सकता है वह मन के अनुकूल कार्य करता हुआ, कभी सज्जनों द्वारा निन्दित नहीं होता।³
(द) राजधर्म सम्बन्धी सूक्तियाँ :
ग्रन्थकार द्वारा "राजनियम" से सम्बन्धित सूक्तियाँ भी दर्शायी गयी हैं। यथा-राजा के प्रसन्न होने पर श्वेत छत्र, मनोरम अश्व, मदशाली गज प्राप्त होते हैं।⁴
राजा कोई साधारण व्यक्ति नही होता, यह अलौकिकरुप धारी होता है और तुम तो हे शत्रुओ को सन्ताप देने वाले! विक्रमादित्य (विक्रम में आदित्य से) यथार्थनामा हो।⁵
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उदीरितोऽर्थ पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति नोदिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धय ।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 86, पृष्ठ स० 70. -
न नीचजनससर्गान्नरो भद्राणि पश्यति।
दर्शयत्येव विकृति सुप्रियेऽपि खलो यतः।।
शुकसप्ततिः, श्लोकसं० 126, पृष्ठसं० 109 -
सोढु त्यक्तुं च यः शक्तो मनसा कृतमन्यथा।
मनोऽनुकूलता कुर्वन्न् स निन्यः सदा सताम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 114, पृष्ठस० 96 -
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः।
सदा मताश्च मातङ्गा प्रसन्ने सति भूयतौ।।
शुकसप्ततिः, श्लोकस० 46, पृष्ठसं० 38 -
इन्द्रात्प्रभुत्व ज्वलनात्प्रताप क्रोध यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञ क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 49, पृष्ठ सं० 39.
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