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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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राजदण्ड तथा विषय कार्य की सिद्धि में संशय होने पर जो सन्दिग्ध मन वाले राजाओं के संशय को दूर करने में समर्थ होते हैं वे प्रधानता (महत्ता) को प्राप्त होते हैं।¹ इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि ग्रंथकार को सामाजिक, राजनीतिक, शिक्षात्मक इत्यादि पक्षों का बहुत ही सूक्ष्मज्ञान था।

(य) <u>अन्य पद्यात्मक सूक्तियाँ :</u>

न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यन्न मानयन्ति ये।

जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।²।।

जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्य जन का सम्मान नहीं करते, वे (संसार में) निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।

व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृह्मात्मनः।

अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्तिभाजनम्।।³।।

इस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया (तदनुसार माता-पिता की सेवा कर) ससार में कीर्तिमान हुआ और मरने के बाद भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।

तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।

मृतो मृत इति ज्ञात्वा श्रणात्स्नेहो निवर्तते।।⁴


1 राजग्रहे समायाते विमये कार्यसंशये।
सन्दिग्धमनसां राज्ञा प्रधानाः संशयच्छिदः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 47, पृष्ठ सं० 38
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 5, पृष्ठ सं० 6
3 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 7, पृष्ठ सं० 7

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