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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

Page 199 of 208

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Page 199

न वक्तव्यं ध्रुवं देवि पापं दृष्टं श्रुतं मया। कथापि खलु पापानामलम श्रेयसे यतः।।¹

मैने जो पाप देखा या सुना है, निश्चय रुप से उसे नहीं कहना चाहिए क्योंकि पापों की चर्चा भी निश्चय अहितकारक होती है।

तस्माद्यो भाषितु वेत्ति धर्मे चार्थे स्मरे तथा। कस्तं धर्षयितु शक्तो नरेषु कमलानने।।²

हे कमलमुखि! धर्म–अर्थ–काम के विषय में जो मनुष्य बोलना जानता है उसे पुरुषों में कौन ऐसा है जो बल से जीत सकता है? अर्थात कोई नहीं।

मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः। तुण्डे तुण्डे नवा वाणी गेहे गेहे पतिव्रता।।³

प्रत्येक मस्तिष्क में भिन्न–भिन्न मति होती है, विभिन्न जलाशय में विभिन्न जल होता है, विभिन्न मुख मे विभिन्न वाणी होती है, विभिन्न घर में विभिन्न पतिव्रता होती है।

गजाः सन्ति हयाः सन्ति विचित्राः सन्ति सम्पदः। त्वदीये च मदीये च दुर्लभं भस्म याज्ञिकम्।।⁴

तुम्हारे तथा हमारे हाथी, घोड़े तथा विचित्र सम्पत्तियाँ हैं किन्तु यज्ञ का भस्म दुर्लभ होता है।

समयोचितमारम्भ कुरुते यस्तु कृत्यवित्। सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।।⁵।।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 237, पृष्ठ सं० 205
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 239, पृष्ठ स० 208
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 245, पृष्ठ सं० 213–214
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 249, पृष्ठ सं० 219–220
5 शुकसप्तति, श्लोक स० 278, पृष्ठ स० 237

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