शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextइस प्रकार जो कृत्यवित् समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता सदा जीवित रहता है।
गच्छ देवि न कर्तव्यो विलम्बः पुण्यकर्मणि
यदि वेत्सि भये कर्तुं सुबुद्धिर्हंसराडिव।¹
देवि। यदि भय आ पड़ने पर सुबुद्धि हंसाधिपति की भाँति करना जानती हो तो जाओ, सत्कर्म में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।²
(श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसंद नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।
समुद्रवीचीव चलस्वभावा. सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्तरागाः।।
स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थ निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति।।³
समुद्र के तरङ्ग के समान चञ्चलस्वभाव वाली सायंकालीन बादल के समान क्षणिक अनुराग रखने वाली स्त्रियाँ स्वार्थ सिद्ध करने के बाद अर्थ-शून्य पुरुष को निचोडे हुए महावर की भाँति त्याग देती हैं।
एताः प्रविश्य हृदयं सदयं नराणां ।
किं नाम वामनयना न समाचरन्ति।।⁴
ये स्त्रियाँ पुरुषों के दयालु हृदय मे प्रवेश कर मोहती हैं मतवाला बना देती हैं, तिरस्कार करती है, फटकारती हैं, सुख देती हैं, विषाद उत्पन्न करती हैं, ये कुटिल नेत्र वाली स्त्रियाँ क्या नहीं करती ?
1 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 310, पृष्ठ सं० 261
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 314, पृष्ठ सं० 263
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 329, पृष्ठ सं० 275
4 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 330, पृष्ठ स० 276.
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