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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

Page 204 of 208

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Page 204

शीर्षं छिद्यताम् अपभवतु बन्धनं चलतु सर्वथा लक्ष्मीः।
प्रतिपन्नपालने सुपुरुषाणां यद् भवतु तद् भवतु।

अर्थात् स्वीकार किये गये कार्य को पूरा करने में सत्पुरुषों का जो हो वह हो, चाहे शिर कट जाय, बन्धन में पड जायें अथवा लक्ष्मी चली जायें परन्तु स्वीकृत का पालन करते हैं।

पिअर विढत्तइ दव्वइ चुड्डिरि को ण करेइ।
सइँ बिढवइ सइँ भोजअइ विरला जणणि जणेइ।।$^२$

पित्रार्जितं द्रव्य भोगिनं कं न करोति।
स्वयमर्जयति स्वयं भुङ्क्ते विरला जननी जनयति।।

पिता द्वारा अर्जित धन किसे विलासी नहीं बना देता। जो स्वयं धन पैदा कर उसका स्वयम् उपभोग करता है ऐसे पुत्र को कोई विरली माता ही पैदा करती है।

महिलारत्ता पुरिसा छेआ वि ण संभरन्ति अप्पाणं
इअरे उण तरुणीणं पुरिसा सलिलं व हत्थगअं।।"

(महिलारक्ता. पुरुषाश्छेका अपि न सम्भरन्ति आत्मानम्।
इतरे पुनस्तरुणीनां पुरुषा. सलिलमेव हस्तगतम्।।)

स्त्रियो में अनुरक्त नागरिक भी पुरुष अपने पर अधिकार नहीं रख पाते (स्त्री के वश में रहते हैं) और अन्य पुरुष स्त्रियों को हस्तगत जल ही होते हैं-जैसे अञ्जलिगत जल धीरे-धीरे बह जाता है उसी प्रकार वे स्त्रियों के हाथ में नहीं आते और स्वाधीन होते हैं।


1 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 11, पृष्ठ स० 11.
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 67, पृष्ठ स० 52.
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 109, पृष्ठ स० 87-88.

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