शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
Page 205 of 208
Read in contextअहरं करं कवोलं थणजुअल णाहिमण्डलं रमणं । इत्थिअजणसामण्णं हिअअं जं जस्स तं तस्स ।।$^1$
(अधरः करः कपोलः स्तनयुगलं नाभिमण्डल रमणम् । स्त्रीजनसामान्य हृदयं यद् यस्या तत् तस्याः ।।)
अधर, कर, कपोल, स्तनयुगल, नाभिमण्डल और जघन प्रदेश ये सब तो सभी स्त्रियों में समान होते हैं किन्तु हृदय जो है वह जिस किसी के ही होता है—हृदय से प्रेम करने वाली प्रेयसी कोई ही होती है।
अचला चलन्ति पलए मज्जाअं साअरा विलंघन्ति । गरुआ वि तह विकाले पडिवण्ण साध सिढिलेन्ति ।$^2$
(अचलाश्चलन्ति प्रलये मर्यादां सागरा विलङ्घन्ते गुरुका अपि तथा विकाले प्रतिपन्नसाधनं न शिथिलयन्ति ।।)
प्रलय मे पर्वत चलते हैं, सागर भी मर्यादा त्याग देते हैं, किन्तु विपत्ति में भी महान व्यक्ति स्वीकृत के पालन को शिथिल नहीं करते।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 153, पृष्ठ स० 122. 2 शुकसप्तति, श्लोक स० 165, पृष्ठ स० 130.
[ 195 ]