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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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बहेलिया, कपोत--कपोती आख्यान, जन्मेजय प्रसङ्ग, ब्राह्मण बालक की कहानी, सेमल वृक्ष, वायु आख्यान, गौतम, वृत्रासुर आदि आख्यान। अनुशासन पर्व में-सुदर्शन आख्यान, विश्वामित्र जन्म, गीदड और वानर, शूद्र और मुनि, राजा कुशिक, च्यवन मुनि, राजा नृग की कथा, सप्त-ऋषियो के यज्ञ आदि आख्यान महाभारत जैसे-कथा-साहित्य के शिल्प मे नग हैं।

इसी प्रकार कमानुसार उपर्युक्त कथा साहित्य अपनी अबाध गति की अजस्र धारा बहाता हुआ वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, रामायण, महाभारत की सम्पूर्ण कथा, परम्पराओं को पूर्ण विकसित करते हुए पुराणों में भी अपना अक्षुण्ण स्थान बनाये हुए है। महाभारत की तरह पुराणों की भी विशालता का ओर-छोर नहीं हैं। पुराणों में भी मानव जीवन के हर क्षेत्र के सम्पूर्ण पहलुओं को पुराणों के कथा-साहित्य द्वारा पूर्णतया संस्पर्श एवं संस्कार किया गया है। (आधुनिक भारतीय समाज अपने नियमन को प्रतिष्ठित करता है जिसका मेरुदण्ड पुराण ही है।)$^1$

शब्दकोषो के अनुसार प्राचीन कथाओ एवं आख्यायिकाओं का संग्रह पुराणों का अपर नाम है, जिनमे पवित्रतम् धरोहर के रूप में हमारा कथा-साहित्य सुरक्षित है। धार्मिक दृष्टिकोण से रचा गया यह पूर्ण कथा-साहित्य लौकिक व्यवहारों के समस्त अङ्गों का भी पूर्णतया प्रणयन करता है। पुराणों में आख्यान शैली का प्राबल्य है। मानव-जीवन के अभिन्न अङ्ग, दया, परोपकार, मैत्री, करूणा, आस्तेय, अपरिग्रह, सत्याचरण, ब्रह्मचर्य, साहस, सरलता, निरभिमानिता, त्याग, संयम, व्रत, उपवास, जप-तप, दान, तीर्थाटन आदि के नियमन के प्रसङ्ग पुराणों में सर्वत्र बड़े ही रोचक हैं। पुराणों के अनगिनत उपदेश जो सहस्रों वर्षों से मानव कल्याण हेतु प्रयुक्त होते आये, उनकी आज भी उतनी ही महत्ता है।


1 संस्कृत साहित्य का इतिहास-बलदेव उपाध्याय।

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