शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextकथा साहित्य के अंकुरण से लेकर फल तक का विकास सुस्पष्ट है। संहिताओं में प्रक्षिप्त होकर धीरे-धीरे कालान्तर मे वही कथा के तत्व बीज रूप में ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यको के आख्यानों में पूर्णतया अंकुरित होकर रामायण, महाभारत, पुराणों के आख्यानो मे पल्लवित, वृहतकथा, जातक, पञ्चतन्त्र में आकर विकास के क्रम में पुष्पित होते हुए बेताल-पचविंशतिका, दशकुमार-चरित एवं हितोपदेश आदि कथा सग्रह के रूप में समाज के सच्चे मायने में पथ प्रदर्शक हैं।
कथा साहित्य प्राचीन काल से लेकर अब तक की अपनी पूरी यात्रा में सस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि अनेकशः भाषाओं का सहारा लेकर युगों से प्रवाहमान होता हुआ एक ही जैसा दृष्टिकोण या शिल्प सौन्दर्य तथा मान्यतायें नहीं रखा, बल्कि विकास के क्रम मे उच्चाउच्च मार्गों को लाँघते हुए भी भारतीय चिन्तन का निर्देशन एवं शिक्षा बदलते हुए भी परिस्थितियों एवं शिल्प में करता आ रहा है। अपनी संजीवनी शक्ति से भूमण्डल पर विभिन्न रूप से अविकसित कथा शिल्प में पूर्ण योगदान करता चला आ रहा है।
कथा साहित्य सबसे अधिक संबलित एवं विपुल संपदा से ओत प्रोत वैदिक काल के उपनिषद् ग्रंथो में विद्यमान है। उन्ही से अनुप्राणित होकर रामायण, महाभारत कालीन कथा-साहित्य सुविकसित होकर विश्व में अपना कोई शानी नहीं रखता। थोडे में हमने पीछे भी कथा साहित्य के विकास पर छिट-पुट विमर्श किया है। अब यहाँ भी इसके विकास पर अधिक न कहकर केवल आध्यात्मिक चेतना से भरपूर मनोरञ्जन की दृष्टि से भी पूर्ण उपयोगी भारतीय कथा कहानियाँ नीतिपरक एवं अधिकांशतः शिक्षाप्रद एवं उपदेशात्मक ही हैं, चाहे वह किसी रूप में बदलती-बिगड़ती कालक्रम में ढलती रही हैं।
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