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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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  1. इनकी शैली सरल और सुबोध है। इनमें पाण्डित्य प्रदर्शन का सर्वथा अभाव रहता है। कथा में प्रवाह और रोचकता है।

  2. इनमें कथा, नीति, सदाचार, व्यवहार ज्ञान, धर्म, दर्शन, उपदेश और काव्य-सौन्दर्य का सुन्दर समन्वय रहता है।

  3. नीति कथायें गद्य मे और उनसे प्राप्त होने वाली शिक्षा पद्य में वर्णित है। इनका उद्देश्य रोचक कथाओं द्वारा त्रिवर्ग की बातों का मार्मिक उपदेश देना है। इनमे चुभते हुए मुहावरे, अनूठी लोकोक्तियाँ तथा रोचक दृष्टान्तों का सर्वत्र प्राधान्य है।

20 कादम्बरी के अतिरिक्त समस्त सस्कृत-साहित्य प्रसादगुण वाली भाषा में लिखा गया है।

  1. जहाँ भी कथा के मध्य छन्द आये हैं, आर्या, अनुष्टुप आदि लघु छन्द ही प्रमुख हैं, किन्तु कालान्तर में रचित कथाओं के मध्य विशालकाय चतुःचरण वाले छन्द भी प्राप्त होते हैं।

  2. सामासिक शैली के प्रधान ग्रन्थों "दशकुमारचरित", "वासवदत्ता" एवं कादम्बरी के अतिरिक्त वर्णन विस्तार न्यून रूप से प्राप्त होता है।

  3. नीति कथायें जहाँ उपदेश प्रधान होती हैं, वहीं लोक कथायें कल्पना प्रधान। यदि नीति कथायें पशु-पक्षियों से सम्बन्ध रखती हैं तो लोककथायें मानव जीवन से अनुस्यूत ही नहीं अनुप्राणित भी हैं।

इस प्रकार भारतीय कथायें सामान्य रूप में भारतीय-संस्कृति के अनुसार चलने तथा लोक व्यवहार में निपुण होने का आदेश देती हैं। इनकी शैली सरल एवं रोचक हैं तथा इनमें पांडित्य-प्रदर्शन का सर्वथा अभाव हैं, कथा में प्रवाह और रोचकता सदैव बनी रहती है। "शुकसप्तति" भी इसी प्रकार की रचना है।

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