शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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इनमें जीवन का लक्ष्य आदर्शवादिता न बताकर लोक-व्यवहारज्ञता एवं नीति निपुणता बताया गया है।
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इनमें जीवन के भले और बुरे दोनों पक्षों का वर्णन है। जैसे-जीवन की पवित्रता, कर्तव्य पालन, मित्र की रक्षा, वचन-पालन आदि गुणों के वर्णन के साथ ही ब्राह्मणों का छल-प्रपञ्च और दम्भ, अन्तःपुर के कपट-व्यवहार, स्त्रियों की दुश्चरित्रता आदि दोषो का भी वर्णन है।
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नीति कथाओं के पात्र पशु-पक्षी आदि मनुष्यों के तुल्य मित्रता, प्रेम, विवाद, लोभ, छल, सन्धि, विश्वासघात, विग्रह आदि करते हैं। उनके राजा, मन्त्री, दूत आदि सभी कुछ हैं। वे अवसरोचित सभी कार्य करते हैं। ये मानवीय गुणों और स्वभाव से युक्त होते हैं।
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इनमे प्रमुखता के लिए आदेश या नीति का अंश पद्यों में दिया गया है और कथा गद्य मे दी गई है। एक भाव वाले विभिन्न श्लोक अनेक नीति ग्रन्थों से संग्रह करके वक्तव्य की पुष्टि के लिए दिए गये हैं। स्थान-स्थान पर प्रसङ्गानुसार सुभाषित भी नीतिग्रन्थों आदि से दिए गये हैं।
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इनका प्रतिपाद्य विषय सदाचार, राजनीति और व्यवहार ज्ञान है।
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इनमें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक सभी गुणों का वर्णन है। जिन बातों को न जानने से मनुष्य जीवन में असफल हो जाता है, उनकी चेतावनी भी कथाओं द्वारा दी जाती है।
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ये नीति-कथायें, पशु-पक्षियों आदि से सम्बद्ध हैं, अतः मानव मात्र के लिए रोचक और उपादेय हैं।
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इनमे एक मुख्य कथा के अन्तर्गत अनेक उपकथाओं का समावेश होता है।
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