शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextकर लिया। उसने (लक्ष्मी) कहा 'जो तुम कहो वह करूँ। पूर्णा ने कहा- जिससे कहूँ उस पुरुष के साथ रमण करो।'
इसके बाद लक्ष्मी को तैयार कर आनन्दप्रद सुरत के लिए सायंकाल के समय अपने घर ले गयी। किन्तु वह सुन्दर सुधन नामक वणिक् पुत्र किसी काम में फँस जाने के कारण निर्दिष्ट समय पर नहीं आ सका। तब कामातुरा लक्ष्मी ने कहा-'किसी भी पुरुष को ले आओ।'
तब मूढ़ पूर्णा इती उसके पति को ही ले आयी अपने पति के आने पर उसका बचाव कैसे हो? यह तुम या तुम्हारी सखियाँ बतायें।
उन सबने कहा- 'हम नहीं जानती हैं। तुम्हीं कहो।'
शुक ने कहा- 'अपना पति ही आ रहा है'- यह जानकर उसने उसके केश पकड़कर कहा- हे शठ! सर्वदा तू मेरे सामने कहा करता है कि तुम्हारे अतिरिक्त मेरी और कोई दूसरी प्रिया नहीं है। आज मैंने तेरी परीक्षा कर ली और जान गयी।' इस प्रकार उसने कोप किया।
वह हरिदत्त उसको बड़ी कठिनाई से अत्यन्त कोमल वचनों द्वारा सान्तवना देकर अपने घर ले आया।
इस प्रकार व्यभिचारिणी सखियों समेत मदन विनोद की पत्नी प्रभावती भय एवं विस्मय उत्पन्न करने वाली शुक द्वारा कथित कथा सुनकर रात में सो गयी और परपुरुष के पास नहीं गयी।
कथा- 2
"यशोदेवी की कथा"
दूसरे दिन व्यभिचार करने के लिए उद्धत प्रभावती को शुक रोकता हुआ उसे दूसरी कहानी सुनाता है-
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