शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextनन्दन नामक नगर में नन्दन नाम का एक राजा था। उसके पुत्र का नाम राजशेखर और पुत्रवधू का नाम शशिप्रभा था। उसको वीर नामक धनसेन का पुत्र देखकर कामवासना से युक्त कावमज्वर से पीड़ित हो गया। भोजन आदि नहीं करता था। अपनी माता यशोदेवी से पूछे जाने पर उसने गद्गद् वाणी से कारण बताया। उस राजकन्या का मिलना कठिन है। वह कैसे जिये' यह प्रश्न है। प्रभावती ने कहा- 'तुम्हीं बताओ'। शुक ने कहा- प्रभावती। यदि आज तुम परपुरूष के पास न जाओ तो बताऊँ। प्रभावती ने कहा ठीक है कहो।
तब शुक ने कहा- उस यशोदेवी ने एक कुतिया को भोजन खिला-पिला कर हिला-मिला लिया और आभूषण पहिनकर अपने साथ उसे लेकर शशिप्रभा के पास जाकर उससे एकान्त मे गद्गद् स्वर में कहा- मैं, तुम और यह, तीनों पूर्वजन्म में बहिन थीं। मैंने निःशङ्क और तूने सशङ्क, परपुरूष की संभोगेच्छा को पूरा किया। इसने नहीं किया। इसी कारण से इसे पातिव्रत रूप सदाचार के प्रभाव से केवल पूर्वजन्म की ही स्मृति है, भोग नहीं, और इस जन्म में कुतिया हुई। परपुरूष के सम्भोगविषयक विघ्न के कारण मुझे पूर्वजन्म का स्मरण भी नहीं है और मुझे निर्विघ्न भोग के कारण निर्विघ्न जन्म का स्मरण है। इसलिए इस कुतिया और तुझको देखकर अनुकम्पा-वश तुझसे यही कहने आई हूँ। अतः तुम्हें याचको को काङ्क्षित वस्तु देनी ही चाहिये।¹ क्योकि कहा गया है-
भिक्षुक घर-घर भीख नहीं माँग रहे हैं, अपितु मानो यह कह रहे हैं कि याचकों को सदा दान दिया करो, अन्यथा दान न देने वाले को ऐसा ही फल मिलेगा जैसे हमें मिल रहा है- हमारी ही तरह वह भी घर-घर भीख माँगता फिरेगा।²
1 'अतस्त्वयार्थिना काङ्क्षितं दातव्यमेव।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं० 16
2 कथयन्ति न याचन्ते भिक्षाहारा गृहे गृहे।
अर्थिभ्यो दीयतां नित्यमदातुः फलमीदृशम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 17, पृष्ठ सं० 16
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