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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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लगीं। जिसकी आवाज महल के बाहर के लोग भी सुन लिए। अब राजा अपने दरबार में उपस्थित सारे विद्वानों (मन्त्रवेत्ता, दैवज्ञ एवं शकुनवेत्ता-जनों) से पूछा लेकिन कोई इस हँसी का कारण न बता सका तब राजा ने अपने मुख्य पुरोहित से इसी हँसी का कारण पूछा और न बताने की स्थिति में देश निकालने की धमकी दी। तब पुरोहित विषादग्रस्त हो पाँच दिन का समय मॉगकर अपने घर चला गया। जहाँ उसकी पुत्री बालपण्डिता ने उसके विषाद का कारण पूछा। उसने कहा विद्वानों को विषाद में भी प्रसन्नचित रहना चाहिए। कहा गया है- जिसे समृद्धि में हर्ष, विपत्ति में विषाद, रण मे कापुरूषता न हो, ऐसे त्रिभुवन श्रेष्ठ विरलेपुत्र को माता पैदा करती है।$^1$ तब ब्राह्मण ने सभी हाल कह सुनाया और कहा कि अगर जीना चाहता हूँ तो ब्राह्मणों के साथ मुझे परदेश चले जाना चाहिए। तब बालिका ने कहा कि तात! तुमने ठीक कहा लेकिन राजा के बिना मनुष्य की कही पूजा नहीं होती।$^2$ क्योंकि कहा गया है कि- राजा की सेवा से साधारण व्यक्ति भी असाधारण एवं मुख्य हो जाता है तथा न करने पर असाधरण भी साधरण एवं नगण्य हो जाता है।$^3$ इस तरह विभिन्न सूक्तियों के माध्यम से बालपण्डिता ने अपने पिता को समझाते हुए कहा कि- हे तात्! तुम राजा के मान्य एवं प्रसन्नता के पात्र हो, तुम स्थिर हो जाओ! मत्स्यों के हँसने का कारण राजा के आगे मै कहूँगी, तुम स्नान तथा भोजन करो।

तब ब्राह्मण के निवेदन पर राजा ने उस बालपण्डिता को बुलाकार उस मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा इस पर बालिका ने कहा- हे राजन्! आप अपना तिरस्कार खुद मत करो क्योंकि-राजा कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता, वह अलौकिक रूपधारी होता है। राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से


1 सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च भीरूत्वम्।
त त्रिभुवनत्रयतिलकं जननी, जनयति सुतं विरलम्।। शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 31, पृष्ठ सं० 32
2 परं स्वामिरहितानां न क्वापि पूजा।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं०- 34
3 अप्रधान प्रधान स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं०- 38, पृष्ठ -34-35

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