शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextअब वह वणिक् मंदिर से प्रतिदिन पाँच मण्डक लाता और उसी से उसका भरण पोषण होता। एक दिन वणिक् भार्या (पद्मिनी) की सखी मन्दोदरी ने उससे उन मण्डको का रहस्य पूछा जिस पर पद्मिनी ने अपनी अनभिज्ञता दर्शायी तो उस सखी ने कहा कि जो इसे तुमने नहीं जाना तो तुम्हारा यौवन, रूप एव जीवन सब व्यर्थ है। तब वह अपने पति से यह रहस्य जानना चाही तो पति ने इसे दैवकृपा कहा तथा पति ने उसे समझाया कि मनुष्य की समृद्धि एवं विपत्ति, जीवन एवं मरण का कारण दैव है।
पति से अस्पष्ट जबाव पाकर उसने अनशन कर दिया। अतः पति ने उसे बहुत समझाया कि इसे कह देने पर बडी हानि एवं पश्चाताप होगा लेकिन उसने नहीं माना। कहा गया है– जिसे देव दुःख देना चाहते हैं उसकी बुद्धि हर लेते हैं जिससे वह अपने कल्याण की बात नही समझ पाता। तब उस बुद्धि रहित ने उसे रहस्य बता दिया। तब उसने अपनी सखी से यह सारा रहस्य बताया। अब अगले दिन जब दोनों के पति गणेश जी के पास गए तो उन्होंने पद्मिनी के पति को दंडित किया तथा उसकी सखी के पति को पाँच मण्डक दे दिया। फलतः पद्मिनी को घोर पश्चाताप हुआ।
कथा- 7
"स्थगिका और ब्राह्मण कथा"
दूसरे दिन पुनः राजा ने बालिका से मत्स्य हास्य का कारण जानना चाहा तो बालिका ने कहा राजन् आप कारण न पूछें वर्ना आपको पश्चाताप होगा।
जिस प्रकार स्थगिका नाम की नायिका में आसक्त ब्राह्मण को हुआ था। वैसे ही आपको भी पश्चाताप होगा।
वत्सोन नामक नगर में वीर नामक राजा तथा केशव नामक ब्राह्मण था। वह पृथिवी पर धन के लिए देवतीर्थों, शमशानों तथा नगरों में घूमता हुआ एक निर्जन प्रदेश में पहुँचा जहाँ उसने कपिल वर्ण के कच्छप पर वीरासन से स्थित तापस को देखा तो उस विप्र ने उसके सामने हाथ जोड़कर धन की याचना की। तब उस तापस ने उसे
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