शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextसिन्दूर दिया और कहा जब तुम इसे स्पर्श करोगे तो यह तुम्हें पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ देगा। लेकिन तुम इसको व्यक्त मत करना अन्यथा यह लौटकर मेरे पास चला आएगा।
अब वह ब्राह्मण रत्नावती पुरी को गया जहाँ वह स्थगिका नाम की वेश्या के साथ नित्य रमण करता था। उसके नित्य के धनागम का रहस्य न जान पाने पर उस वेश्या ने अपनी भक्ति, कला एवं सेवा से उसे इतना प्रसन्न किया कि उस ब्राह्मण ने सारा राज बता दिया। जब वह ब्राह्मण रात में सो गया तो उस वेश्या ने उसका सिन्दूर लेकर धनहीन अवस्था में उसको (ब्राह्मण को) घर से निकाल दिया।
वह विप्र अपना सिदूर न पाकर 'मेरा धन हर लिया गया' चिल्लाता हुआ राजा के पास गया जहाँ कुटनी ने पूछे जाने पर कहा कि यह धूर्त मेरी पुत्री पर लुब्ध है और उसके साथ रमण करना चाहता है इसी कारण यह चोरी लगा रहा है। लेकिन राजा किसी प्रकार सिन्दूर का रहस्य जान गया। किन्तु लोगों के द्वारा वह ब्राह्मण निर्वासित कर दिया गया और सिन्दूर योगीन्द्र के पास पहुँच गया। उस विप्र की न स्थगिका ही रह गयी और न सिन्दूर ही रह गया।
इसी प्रकार राजन्! तुम्हें भी रति और प्रीति नहीं होगी।
कथा- 8
"वणिक पुत्री सुभगा की कथा"
दूसरे दिन बाल पण्डिता ने राजा के आग्रह करने पर कहा कि- राजा का शरीर बहुत महत्वपूर्ण है अतः आपको किसी भी शुभ अथवा अशुभ कार्य के विषय में आग्रह नहीं करना चाहिए। राजन्! मत्स्य हास्य का कारण कह देने पर आपकी भी हालत उस वणिक् पुत्री के समान होगी जिसका न घर ही रहा और न बाहर।
त्रिपुर नामक स्थान का राजा त्रिविक्रम था। जहाँ सुन्दर नामक वणिक् था जिसकी पत्नी अत्यन्त व्यभिचारिणी थी। वणिक् उसे नियंत्रित नहीं कर पाता था। एक बार उसके पति द्वारा घर से बाहर निकलने पर रोक लगाने पर वह अपने सखी की मदद से अपने घर में आग लगवा कर अपने उपपति से मिलने यक्ष मन्दिर में चली
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