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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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इसके पुत्र का नाम राम था। पिता ने उसे सम्पूर्ण विद्यायें सिखवायीं उसकी माता ने एक दिन चन्द्र से कहा एक ही पुत्र होने के कारण मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। चन्द्र ने कहा- तुम्हारा एक ही पुत्र प्रशंसनीय है।

ऐसा कहकर धूर्तमाया कुटनी को बुलाकर कहा कि मैं तुझे सुवर्ण की सहस्र मुद्राएँ दूँगाँ। मेरे पुत्र को स्त्री माया के वञ्चन में निपुण बना दो और कहा कि यदि मेरा पुत्र कहीं भी वेश्या के कपट से पराजित हुआ तो मैं दूनी सुवर्ण मुद्राएँ लूँगा। उसने एवमस्तु कहते हुए उसे वेश्याओं में उत्पन्न होने वाले भावों का अध्ययन कराया।

इस प्रकार समस्त वेश्या चरित सीख लेने के बाद उस कुटनी ने उस पुत्र को बनिये को सौंप दिया। पिता के कहने पर वह व्यापार के लिए सुवर्ण द्वीप गया और वहाँ कलावती वेश्या के साथ एक वर्ष रहा किन्तु वह वेश्या अत्यन्त चतुराई करने पर भी उससे धन न ले सकी तो उसने सारा हाल अपनी माता से बताया। माता बोली कि- प्रपञ्च से ही उसका धन लिया जा सकता है। अतः जब वह अपने देश को जाने लगे तो तुम उससे कहना मैं भी चलूँगी और यदि न ले जाए तो कुएँ में झम् से कूद जाना ऐसा करने से वह तुम्हें सब धन दे देगा। उसने कुटनी के कथनानुसार ही किया और करोड़ों की सम्पत्तित लेकर उसे निकाल दिया।

इस प्रकार धन तथा मान के विषय में पराभव के प्राप्त होने पर अपने देश में आकर पिता को पूरा वृतान्त बताया। तब पिता ने धूर्तमाया को बुलाकर कहा कि तुम्हारे द्वारा शिक्षा देने पर भी अपना सर्वस्व गँवाकर आया हैं उसने कहा तुम फिर से नौका भराकर पुत्र समेत मुझे वहाँ भेजो। वहाँ पहुँचकर अत्यन्त चालाकी से उस कुटनी ने वेश्या से अपना और उसका सारा धन लेकर राम के साथ नौका पर सवार होकर अपने घर पहुँचकर महोत्सव कराया।

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