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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages

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कथा- 24

"सज्जनी और देवक की कथा"

चन्द्रपुर नगर में सूरपाल नामक धनी बढ़ई रहता था। उसकी पत्नी सज्जनी परपुरूष में आसक्ति रखती थी। अपने घर में ही स्थित वह देवक नाम पुरूष से रति करती थी ऐसा लोगो से सुनकर बढ़ई कपट से प्रातः ही घर से निकलकर शाम को गुप्त रूप से आकर पलंग के नीचे बैठ गया। जब उसकी पत्नी उपपति के साथ पलंग पर आरूढ हुई तो पति ने उसके बाल पकड़ लिए।

अतः अपनी ने अपने को बचाने के लिए उस उपपति का मुँह देखकर कहा-मेरे पति इस समय घर पर नहीं है। यद्यपि पति ने तुम्हारा धन लिया है तथापि क्षमा कीजिए। बढ़ई के आ जाने पर तुम दोनों को मिलाऊँगी।

कथा- 25

"श्वेताम्बर की कथा"

चन्द्रपुरी नगरी मे सिद्धसेन नामक बौद्ध संन्यासी लोगों द्वारा बहुत सम्मानित था किन्तु उसी नगर में एक दूसरा जैन साधु भी जो बहुत गुणवान था, आ गया उस गुणी ने सभी नगरवासियों यहाँ तक की बौद्ध भिक्षुओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर दिया था। इसलिए वह बौद्ध लोगों द्वारा उस जैन सन्यासी को सम्मान किये जाने को न सहता हुआ स्वयं उसके निवास स्थान पर वेश्या भेजकर, यह वेश्या में आसक्त सुचरित्रवान नहीं है- इस प्रकार उसकी लोकनिन्दा की। उसे देखने के लिए लोगों को बुलाया और बोला-बौद्ध भिक्षु ही ब्रह्मचारी है, जैनसाधु का अच्छा आचरण नहीं है। लेकिन जैनसाधु भी चालाक था वह दीपक से वासगृह को जलाकर रात बीत जाने पर नंगा हो, वेश्या का हाथ पकड़े हुए बाहर निकला। तभी सर्वत्र यह लोकापवाद फैल गया कि यह तो बौद्ध भिक्षु है, जैन साधु नहीं।

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