शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी
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Read in contextकथा- 30
"शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा"
मधुर नामक वन में पिङ्गल नाम का सिंह प्रतिदिन बहुत से जीवों का वध करता था। इसलिए सब पशुओ ने आपस में विचार करके प्रतिदिन एक-एक पशु भेजने की व्यवस्था की और उसे सब पशुओं का वध करने से मना कर दिया। एक दिन खरगोश की बारी आई और वह सब पशुओं के कहने पर भी नहीं गया और कहा कि आज से उसके पास कोई पशु नहीं जायेगा, इस तरह काफी समय बीत जाने के बाद एक दिन दोपहर के समय ही धीरे-धीरे वह सिंह के पास चला। उसके पहुँचते ही सिंह ने उसे धर दबोचा।
अतः शशक अपने बचाव के लिए सिंह से बोला स्वामी मैं चार खरगोशों के साथ आता हुआ, मार्ग में तुम्हारे शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया, इसी कारण देर हो गई।
सिंह ने कहा– शत्रु कहाँ है?
तब उस धूर्त खरगोश ने एक वाटिका में ले जाकर उसी का प्रतिबिम्ब कुएँ में दिखाया। मूर्ख सिंह क्रुद्ध हो जल में प्रतिबिम्ब देखकर कुएँ में 'झम्' से कूद पड़ा और मर गया।
कथा- 32
"राजिनी की कथा"
शान्तिपुर नगर में माधव सेठ रहता था। उसकी पत्नी मोहिनी और पुत्र सोहड़ थे। सोहड़ की पत्नी राजिनी बड़ी रूपवती चतुर एवं परपुरुषगामिनी थी। एक बार सास ने उसे एक द्रम्म¹ देकर कहा–जाओ बाजार से गेहूँ ले आओ।
¹ द्रम्म—सोलह पण की विशिष्ट मुद्रा,
शुकसप्तति पृष्ठसं० 149
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