सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextसिंहासनबत्तीसी. (७) स्नान करके दरबार किया. पंडितोंको और नजूमियोंको बुलाया और रातका सब अफसान जबानपर लाया. नजूमियोंने बड़ी- साय और वह दिन विचारके कहा राजा ! हमारे विचारमें कुछ यहां लक्ष्मीका लक्षण नजर आता है. और पंडितोंने कहा-इस मकानमें बहुत दौलत है सुनतेही राजाने तमाम शहरोंके बेल- दारोंको हुक्म किया कि, लाख बेलदार वहां जावो और इस मकानकी तमाम जमीन खोदो. वे बमूजिब हुक्मके रवाना हुऐ. साथ उनके सब अपने मुसाहिबोंको भेजा और आपभी सवार होकर वहां आया. बेलदारने जब चारों ओरसे खोदा और वहाँकी मट्टी दूर की तो एक पाया नजर आया. तब राजाने फरमाया अब खबरदारीसे खोदो टूट न जाय. जब खोदते २ चारों पाए सिंहासनके नजर आये तब राजाने कहा-अब इसे बाहर निकालो. लाख मजदूर उठातेथे. और जोर करतेथे पर जराभी वह जगहसे नहीं हिलताथा. तब उनमेसे एक पंडितने अर्ज की कि, महाराज ' यह सिंहासन देवताओंका या दानवोंका बनाया हुआ हे. इस जगहसे नहीं हिलेगा और न उठेगा. बलि लेगा. इसको बलि दीजिये. तब राजाने करोड़ भैंसे और बकरे वहीं बलि दिये चारों तरफ बाजे बजने लगे. और जयजयकार होने लगा. तब बलि लेकर हाथ लगातेही वह सिंहासन ऊपरको उठ आया. झाड बुहारकर एक जमीन पाकीजःपर रखदिया-