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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ८ ) सिंहासनबत्तीसी.

तब राजा सिंहासन देखकर बहुत खुश हुआ, और जब उसकी मट्टी छुड़ाकर गर्द वा गुब्बार दूरकर धोया और पोंछा तब ऐसा चमकने लगा कि, आंख किसीकी उसपर न ठहरतीथी. जिसने उस जडाऊ सिंहासनको देखा उसे खुदाकी कुदरतका तमाशा नजर आया. कारीगरोने ऐसा बनायाथा कि, किसीने न देखा न सुना. और आठ पुतलियां चारों तर्फ बनी हुईथी और एक एक फूल कमलका हर एकके हाथमें दियाथा. अगर सुरभामिनी उसे देखें तो भौचक होजावें. राजाने तमाम कारीगरोंको बुला- कर फ़रमाया कि, जितने रुपये खर्च हों सो खजानेसे लेलो, और जहांजहांका जबाहिर जाता रहा है, वहां नया जडकर जल्दी तय्यार करो. यह कहकर राजा महलमें दाखिल हुआ. सिंहासन बनने लगा, पांच महीनेमें सब तय्यार हुआ. और पुतलियां ऐसी बनकर खड़ी हुईं गोया अभी बोलती हैं और चालती हैं गरज शिरसे पांव तक खबियोंमें भरी हुई आंखें हिरनकीसी कमर चितेकीसी पांवका यह अंदाज जैसी हंसकी चाल. जिन्होने सूरत उनकी देखी अपनी आखोंकी पुतलियोंमें जगह दी. उसे देखकर पंडित राजासे सिंहासनकी हकीकत कहने लगे- हे राजा ! सुनो मरना जीना ये इख्तियार सब भगवानके है, पर मनुष्यको चाहिये कि जीते जी सब जीनेका सुख करले. यह बात राजा सुनकर बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि, शायद पुत-

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