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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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लियां भगवानने अपने हाथसे बनाई हैं ? या इन्द्रके यहांकी अप्सरा हैं ? यह कहकर पंडितोंको हुक्म किया कि, नीकी सायत, अच्छी लगन विचारो जो मैं उस सायत सिंहासनपर जाकर बैठूं। यह बात सुनतेही पंडितोंने बिचार करके कार्तिक महीनेमें एक दिन शुभ लगन ठहराई. सब भांति वह भली थी. कहा कि, उस सायत तुम उस सिंहासनपर बैठो; तब राजाने बैठनेकी बिरियां जितने राजा उसके राज्यमें थे और पंडित, करामाती दूर और नजदीक थे उन्हें न्योता भेजकर बुलाया और आप स्नान करके अच्छे कपडे पहने. पंडित वेद पढ़ने लगे और गंधर्व गीत गाने लगे. भाट यश बयान करने लगे और तरह तरहके बाजे बजने लगे. हरएक महलमें शादियां नाच, राग रंग मचे. जितने लोग आये उन सबकी जियाफत की. ब्राह्मणोंको वृत्ति गांव दिये. भूखोंको खाना और मुंहमांगे रुप्ये बगरे. नंगोको कपड़ा और माल असबाब इनायत किया. रैयतको बखसीस और इनाम दिया. तमाम शहरमें खैर खैरात बांटी. फौजको खिलत और इजाफे कर दिये. हमनशीनोंपर तरह तरहकी मिहरबा- नियां नवाजिशें फरमाई, गरज जितनेलोग उस सभामें इकट्ठे हुएथे सो सब जयजयकार करतेथे और रामका नाम लेतेथे- बीचमें सिंहासन धरा था. राजा खुशी २ श्रीगणेशको मनाता हुआ सिंहासनके पास जाकर खड़ाहूआ और दाहिना पांव बढ़ाकर