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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १०० ) सिंहासनबत्तीसी.

कि सब कुल गँवाया. और भस्मासुने महादेवजी तपस्या कर बर पाया और उन्हींसेही विश्वासघात किया कि, पार्वतीजीको लेनेकी इच्छा की और उसकाभी फल उसने तुर्त पाया कि, क्षणभरमे आपही जलमे भस्म होगया. और कुँवर ? तु मित्र द्रोही और विश्वासघाती क्यों हुआ है ? सोएहुए रीछको तूने नीचे ढकेल दिया ! उसने तो तेरेपर उपकार किया था और तूने उसका बुरा बिचारा. पर उसमें तेरा दोष कुछ नहीं है, तेरे पिताका दोष है; इसवास्ते कि, जैसा बीज होवेगा वैसाही फल होवेगा. यह तुमने अपने पिताके पापसे दुःख पाया. इतनी बात सुनतेही कुँवर सचेत हो बोल उठा. तब राजा बोला-अय सुंदरी ! तू सच कह कि तूने वह बनका जानावर क्योंकर पहॅचाना ? यह उसे सुनकर उसने जवाब दिया कि- राजा! मैं अपनी पूर्व अवस्था तेरे आगे प्रकट करतीहु सो चित्त लगाय सुनो जब मै अपने गुरूके पास पढ़ने जातीथी तब गुरूका अति सेवा करतीथी. गुरूने प्रसन्न होकर एक मंत्र मुझे बताया. वह मंत्र मैने साधा, तबसे सरस्वती मेरे मनमें बसी है. और जैसे मैने रानीकी जांघका तिल पहँचाना वैसेही बनके रिंछकोभी जाना. यह सुनतेही राजा प्रसन्न हो पदरा दरमियानसे दूरकर दिया और कहा कि-तू सच्चा शारद- पुत्र है, तेरे गुणको मैने अब जाना. यह कह राजाने आधा राज उसे दिया और अपना मंत्री किया. इतनी बात कह