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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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सोरहवीं पुतली १६. ( १०१ ) वह ब्राह्मण बोला कि-राजा वीरविक्रमादित्य ! यह इस श्लोकका अर्थ है. यह कथा उस ब्राह्मणके मुंहसे सुनकर राजा वीर विक्रमादित्यने उसे हजार गांव वृत्ति कर दिया. यह बात कहकर पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! तुझमें इतना गुण कहां है ? और अब इस नगरमें विक्रमादित्यके समान राजा होना मुश्किल है. मैंने तुझसे यह सच बात कही. और तू इस सिंहासनके योग्य नहीं. ऐसा सुन उस दिनकीभी साअत जाती रही. राजा महलमें दाखिल हुआ और अपने प्रधान और पुरोहितको बुलाके वह हालत कही. दूसरे दिन सुबहको उठ स्नान पूजा कर ध्यान लगा सिंहासनके पास जाकर खड़ा हुआ और प्रधानको बुलाकर कहा कि-अब मेरा जी चाहता है कि, सिंहासनपर आज बैठूं. बेहतर है कि, दुघड़ी अच्छा मुहूर्त इस वक्त मुझे देख दो. तब दिवानने कहा-महाराज ! आप तो बैठियेगा पर पुतलियां आपके आगे रोरो मरेंगी. राजा उठकर खड़ा रहा तब सुन्दरवती-- सोलहवीं पुतली-- बोल उठी-सुन राजा भोज ! मैं तुझसे विचार कर कथाका अहवाल कहती हूं. उज्जैन नगरीमें छत्तीस कौम और चार जाति बसती थीं. एक वहांकाही नगरसेठ जिसके यहां अति धन था