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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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(१०२) सिंहासनबत्तीसी.

और बड़ा प्रतापी था नगरके लोगोंको व्यौहार करनेके लिये बहुत माया देता लेताथा. जो कोई उसके पास अपना स्वार्थ. विचार कर जाताथा वह खाली फिरकर नहीं आताथा. उसका बेटा रत्नसेन नाम बहुत सुंदर था, और अति विद्यावान् माता पिताकी आज्ञामें निशिदिन रहता. उस सेठके मनमें आया कि, कहीं अच्छी सुन्दरी कन्या ठहरा उसकी शादी कर दें. ऐसा ठहराय ब्राह्मणोंको बुला देश देश भेजा और कह दिया कि, जहां कहीं अच्छी लडकी ठहरे वहांका टीका लेके तुम आओगे तो बहुत कुछ धन तुम्हें दूंगा. और कुछ रुपये खर्चको दे बिदा किया. ब्राह्मण देश देश ढूढ़ने लगे. उनमेंसे एक ब्राह्मणने समाचार पाया कि-समुद्रके पार एक सेठ है और उसकी बेटी बहुत सुंदर है उसेभी वरकी तलाश है. यह सुनकर एक जहाजपर बैठ समुद्रके पार हुआ. वहां जा सेठका ठिकाना पूँछकर उसके द्वारपर ठहरा. और खबर दी कि, उज्जैन नगरीसे एक ब्राह्मण वहांके सेठका आया है. यह खबर सुन उस सेठने उसको बुलाया और दंडवत् कर आसन दे बिठाया. ब्राह्मण आशीष देकर बैठा. सेठने पूंछा-किस कार्यके लिये तुम आये हो ? सो कहो ? ब्राह्मणने कहा-हमारे सेठने अपने लड़केकी शादीके लिये भेजा है, और कह दिया है कि, जहां कन्या अच्छी कुलीनकी ठहरे वहांका टीका ले हमारे पास