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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ११२ ) सिंहासनबत्तीसी.

छाड राजा पाओं पाओं शहरको चला तो देखता क्या है कि एक दुर्बल भूखा ब्राह्मण चला आता है. जब वह पास आया तब उनसे कहा कि-राजा ! मैं भूखा ब्राह्मण हूं कुछ मुझे भिक्षा दो तो मैं जाकर अपने कुटुंबको पालूं. यह सुनते राजा चिंता कर अपने मनमें कहने लगा कि-इस ब्राह्मणको इसमेंसे एक लाल दूं यह विचार कर ब्राह्मणसे कहा कि-देवता ! इस बखत मेरे पास चार रत्न हैं और उन चारोका एक एक गुण है इस वास्ते जो तुम इनमेंसे चाहो वह मैं तुम्हें दूंगा, तब ब्राह्मणने कहा-पहले अपने घर हो आऊं तब तुमसे कहूं यह कहकर ब्राह्मण अपने घर गया और राजा वहां खडा रहा वह घरपे जाकर अपनी स्त्री पुत्र और पुत्रकी स्त्रीसे कहने लगा कि, उन चारों लालोका यह ब्यौरा है. तब उन तीनोंसे ब्राह्मणी बोली कि-स्वामी ! तुम वह लाल लो कि, जो लक्ष्मी देता है सो, और ख्याल मनमेंसे उठादो; क्योंकि लक्ष्मीसे मिलते हैं सहाय और लक्ष्मीसे होते हैं सब उपाय. धर्म, ज्ञान, नेम पुण्य. दान यह सब लक्ष्मीसेही होते हैं. इससे तुम और तरफ चित्त मत डुलाओ और जाकर लक्ष्मी लेआओ. फिर उसका पुत्र बोला-लक्ष्मी किस कामकी है ? जो साथ सामान न हो और जो सामान हो तो राजा कहावे, और सब कोई शीर नवावे. सामान हो तो दुर्जन डरे और संसारमें