BharatKosha
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

Page 114 of 190

Read in context
Page 114

सत्रहवीं पुतली १७. ( ११३ )

शोभा पावे. जो घरमें लक्ष्मी हुई और जगमें शोभा न पाई तो उस पुरुषका जन्म लेना निष्फल है. तुम वह लाल लो कि तो इस संसारमें शोभा दे. उतनेमें उसके बेटेकी बहू बोली कि- तुम वह लाल लो कि, जो अच्छे आभूषण दे. गहने पह- ननसे स्त्री अप्सरा मालूम हो. जो रांडभी पहने तो अति सुंदरी दिखाई दे. और विपत् पडे तो बेंच बेंच बहुतसा धन ले. और जितना मांगोगे उतना इससे पाओगे. और पुरुष हमारा बावला है और सास बुद्धिहीन है इससे ससुरजी तुम सज्ञान हो और तुमसे मै कहतीहूं वही लाल लेकर आओ जो मैंने तुमसे कहा है. उससे तुम सब कुछ पाओगे. यह सुन- कर ब्राह्मण बोला कि—तुम तीनों बौराये हो. और मेरी इच्छा सिवाय धर्मके और कोईमें नहीं; क्योंकि धर्मसे संसारमें आ- दमी राज पाता है, और धर्मसे सब काम सिद्ध होते हैं. धर्म- सेही जगमें यश होता है. और धर्म करनेसे देखो कि राजा बालिने पातालका राज पाया. और धर्मसे ही राजा इंद्रने स्वर्गमें जाकर इंद्रासन पाया. और धर्मसे यह काया अमर हो जाती है. गर्भवास छूट जाता है. इसमें तुम मेरा धर्म मत डुबावो. और मैंभी अपना सत न छोडूंगा इससे जो हो सो हो. इसी तरह चारोंने चार मत किया. और एकका एकने नहीं माना तब वह ब्राह्मण घरसे फिरकर निकट आया