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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ११४ ) सिंहासनबत्तीसी.

और सब अहवाल राजाको सुनाया, और कहा कि-महाराज मैं घर तो गया पर बात कुछभी बन न आई, अपनी अपनी सब कोई कहता है और हम चारोंकी चार मती हैं, और आपने यहां खडे होकर हमारे लिये दुःख पाया पर हमारा मतलब नहीं आया. यह सुन राजाने कहा कि-महाराज ! तुम अपने चित्तमें निराश होकर उदास न होना, चारों लाल अपने घरको लेजाओ मैं तुम्हे देताहूं क्योंकि जिसमें तुम्हारा कुटुंबभी प्रसन्न हो और तुमभी, हमारा इसीमें कल्याण है निदान राजाने चारों लाल ब्राह्मणके हाथ दिये. ब्राह्मण लेकर खुश हुआ और आशीष दे अपने धामको गया, सुन राजा भोज ! राजा विक्रमादित्यभी अपने मन्दिरको गया और दान देते कुछ वि- लंब न लाया, ऐसा दानी और प्रतापी अब इस कलियुगमें कौन है ! जो उसके समान हो वह इस आसनपर बैठे और नहीं तो नरकवास पावे. अभी तू अपने मनमें मत उकता धीरज धर और आगे कथा सुन जो, जो राजाने साहस और दान किये है. यह बात पुतलीकी सुनकर राजा भोज सिंहासनके पाससे उठकर घर आया, और सारी रात सोच चिंतामें गॅवाई, सुबह होतेही स्नान पूजा करके बैठा, इतनेमें दीवान प्रधान आकर हाजिर हुए, सबको साथ ले सिंहासनके पास जानाचाहा कि पांव उठाकर धरें तब रूपरेखा -----

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