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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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(११६) सिंहासनबत्तीसी.

उसका ताबेदार. और जो कदाचित् मन अपना अमल किया चाहे तो ज्ञानसे कुछ इसका वश नहीं चलता. मनके काबूमें हैं इंद्रियां वह चाहे तो उनसे कर्म करवावे. पर ज्ञान नहीं करने देता. जब ज्ञान आता है तब वह मनको मार कर नि- काल देता है और पांचों इंद्रियांभी ज्ञानके वश हो खडसे छूटी हुई हैं. जब मनुष्यसे मन और इंद्रीका विकार छूटा निर्भय हुआ संसारके भयसे और योग सिद्ध हुआ. दोनोंकी ये बातें सुनकर राजा बोला कि-तुमने जो कहा सो मैं सब समझा. इसका उत्तर बिचार कर तुम्हे दूंगा. कितनी एक देरके बाद राजाने सोचकर कहा कि-सुनो योगेश्वर ! चार वस्तु एक साथ रही हैं. अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी इन चारोंसे शरीर है. मन इनका सरदार है. मनकी मतिसे जो ये चलें तो घडी पलमें नाश कर दें. पर उनपर ज्ञान बली है. मनका विकार होने नहीं देता. और जो नर ज्ञानी हैं उनकी काया विनाशको नहीं पाती. वे इस संसारमें अमर हैं. और जबतक योगी ज्ञानसे मनको नहीं जीते तबतक उसका योग सिद्ध नहीं होता. ये बातें राजाकी योगियोंने सुन अपने मनका हठ छोड़ दिया- और वे योगियोने प्रसन्न होकर राजाको एक खडिया कलम देकर कहा कि इसमें ये गुण हैं जो इससे दिनको तुम लिखोगे सो रातको प्रत्यक्ष सर्व देखोगे. यह कहकर दोनों योगी चले