सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context[Header] अठारहवीं पुतली १८. (११७) गये. राजाने अपने जीमें अचरज माना कि, यह बात किस तर- हसे सत्य होगी ? तब राजाने एक मंदिर खाली करवाया, और झड़वा घुलवाय लिपवा अकेले उसके घरमें जा बिछौना बि- छावा किंवाड़ बंदकर दीवालमें सुरत लिखने लगा. पहले कृष्णकी मूर्ति लिखी, पीछे सरस्वतीकी फिर देवताओंकी. इतनेमें सांझ हुई और एक बार जय जय शब्द होने लगा. जो जो देवता लिखेथे सो साफ देखे. देखतेही राजा मोहित हो गया. और जो जो बातें वे आपसमें कहतेथे वह राजा सब सुनताथा. इत- नेमें प्रभात होगया. और देवताओने उठ उठ अपनी अपनी राहली. और पुतलीकी पुतलियां रहगईं, फिर राजाने दूसरी तरफ दीवालपे हाथी, घोडे, पालकी, रथ और फौज यह सब कुछ लिखा. फिर जब शाम हुई तो वे सब हाजिर हुये. राजा देख देख अपने जीमें प्रसन्न होताथा. और योगीको याद कर- ताथा कि, मुझे वह पदार्थ दे गया. जब भोर हुआ तब वह चित्रका चित्र रहगया. फिर तीसरे दिन राजाने पहले एक मृ- दंगी लिखा. फिर गंधर्व लिखा. पुनि अपागयें खैंची लालबीन, रबाब, तबूरा, मुहचंग, सितार, पिनाक, बाँसुरी, करताल, अल- गोजा, एक एक राज एक एक मूर्तिके हाथ दे दे लिखा. जब संध्याका समय हुआ. तब पहले एक शब्द हुआ. और गंधर्व संगीतशास्त्रकी रीतिसे गाने लगे. और साज स्वरोंके साथ