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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ११८ ) सिहासनबत्तीसी.

मिल मिल बजने लगे. और वे अप्सरायें नृत्य करने लगीं और भाव बताने. इस तरहसे राजा हमेश आनंदसे रात काटताथा. और दिनको यही लिखताथा. इसी तरहसे वह रात दिन वहां व्यतीत करता और रनवासमें नहीं जाताथा. तब रानियोंके जीमें चिंता हुई कि राजा किस कारण महलमें नहीं आता ? और जुदे मंदिरमें रहता है इसका क्या सबब है ? यह मालूम किया चाहिये. यह रानियां आपसमे मत ठान राजाका खोज लेनेको तैयार हुईं और उनमेंसे चार रानियां आपसमे विचार करके कहने लगीं कि हमारा जीनाभी धिकारकासा है- और जगमेंभी हमको धिकार है कि राजा हमें छोड़ वहां बैठ रहा है. और हम यहां विरहमें दुःख पाती हैं इतने दिनों तो हम दुःख मरीं पर अब एक दिनभी बिन प्रियतम नहीं रहा जाता. यह विचार कर रातको सवार हो जिस मंदिरमें राज- बैठा कौतुक देख रहाथा. ये भी वहां जा पहुँचीं. और हाथ जोड़ बिनती कर कहनेलगीं कि, महाराज ! हमसे क्या अपराध हुआ है ? जो आप हमारी सूरत बिसरा यहां बैठे रहे हैं. यह सुन राजा हँसकर बोला कि, सुनो सुंदरियो ! तुझे किसीने सताया है और किस कारण तुम यहाँ आई ? क्या तुम्हें किसीने कुछ कहा है कि यह तुम्हारा मुखचंद्र मलीन हो रहा है ? राजाकी यह बात सुन शिर निहुडाके उन्होंने कहा कि स्वामी ! जो बात है