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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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अठारहवीं पुतली १८. ( ११९ ) सो आपके सन्मुख हम प्रकाश करती हैं, तब राजाने कहा अच्छा, जो कुछ कहना हो सो कहो. तब उनमेंसे एक रानी जो चतुर थी सो बोली-महाराज ! हम अबला हैं और कभी कुछ नहीं देखा सुखहीमें उमर गँवाई और अब विरहमें काम निशिदिन हमें दहता है सो दुःख हम तुम्हारे सिवाय कससे कहें ? इस व्यथासे हमें आप बचाइये. और अपने हमसे बचन कियाथा कि हम तुम्हें पीठ न देंगे. सो इतनी मुद्दतसे तुमने बिसार दिया. इतने दिनोंतक जिस तरह हुआ हमने वियोग मारा अब हममें बल नहीं कि अब वियोग सहन करेंगी. इसी तरहकी बाते करती हुई तो सुबह होगई और वे सब मुर्तें फिर नकशीदार और दीवालें होगई. तब रानियोंने कहा की- महाराज ! जबसे तुमने मंदिर छोडा तबसे दुःखही सदा रन- वासमें हो रहा है. और उन रानियोंका पाप आपको लगता है क्योंकि सब आपही के आसरेमें हैं. ये बातें सुन राजा हँसकर बोला कि-अब जीमें तुम प्रसन्न हो. जो तुम कहोगी सोही हम करेंगे और जो मांगो सो हम देंगे. तब रानियां खुश होकर बोलीं-महाराज ! हमारे मांगनेसे जो आप देंगे तो हम मांगें. राजाने कहा-जो तुम मांगोगी सो हम देंगे. रानियोंने कहा- महाराज ! यह जो खडिया आपके हाथमें है सो हमे दो. यह सुनतेही राजाने आनंदसे हवाले की. रानियोंने लैली और छिपा रक्खी. फिर सवार हो अपने अपने महलमें आई और