सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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राजाभी आकर दाखिल हुवा. और अपना राजकाज करने लगा. इतना कथा कह रूपरेखा पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! ऐसा पदार्थ देते राजाने विलंब न किया. और ऐसी विद्या तू कहां पावेगा ? और जो पावेगा तो तुमसे दी नहीं जायगी. इससे इस आसनके ऊपर बैठनेका तू अदब छोड़दे. मैं तुझसे सच कहतीहूं तू बौरा न जा, और उस योग्य तू नहीं. वहभी सायत गुजर गई. राजा उठकर वहांसे महलमें दाखिल हुवा. तमाम रात सोचमें गुजरगई- सुबह उठ स्नान पूजामें फरागत कर फिर उसी मकानमें आया. सिंहासनके पास खडा हो चाहा कि पांव उठाकर धरें इतनेमें तारा नामक--- उन्नीसवीं- पुतली बोली-कि हे राजा ! तू अज्ञानी बावला हो- कर यह क्या करता है ? पहले मैं तुझसे एक बात कहतीहूं सो सुनकर पीछे और विचार कर. जो तुम इस सिंहासनपर चरण रक्खोगे तो सबके अपराधी होगे, मुझपर पग दिया था राजा विक्रमादित्यने. तूने अपने जीमें क्या विचारा है ? जो यह इरादा करके आया है ! मेरा हृदय जो है सो केवल कमल है और मधुकर बीर विक्रमादित्य था. तू गोबरका कीड़ा है और मुझपर पांव किस तरह रक्खेगा ? राजा बोला-सुन बाला ! तूने मुझे गोबरका