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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२१ )

कीडा क्यों कर जाना ! तब पुतली बोली-सुन राजा भोज ! एक दिनकी कथा, एक ब्राह्मण सामुद्रिक नाम सामुद्रिक पढा हुआ था, बनमें चला जाताथा, उसके बराबर दुनियांमें कोई और पंडित न था, अनेक अनेक विद्याके भेद जानताथा, उसने दर्याफ्त किया कि इस रस्ते कोई आदमी गया है, जब उसके निशान पांवके देखे तो उसमें उर्ध्वरेखा और कमलका चिन्ह नजर आया तब वह अपने जीमें विचार करने लगा कि कोई, राजा नंगे पांव इस रस्तेसे गुजरा है इसको देखा चाहिये कि वह कहां गया है ! यह विचारकर उन पांवोंका निशान देखता हुआ जब कोशभर जा पहुँचा तो उस बनमें देखा कि एक आदमी दरख्तसे लकडिया तोडकर गठडी बांध रहा है. तब ब्राह्मण उसके पास जाकर खडा हुआ और पूंछा कि-तू यहां इस बनमें कबसे आया है ? वह बोला-महाराज ! दो घडी रात रहनेसे इधर आयाहूं तब ब्राह्मणने पुछा कि, तूने किसीको इस रास्तेसे जाते देखा है कि नहीं ! उसने कहा किं-महाराज ! मैं जिस समयसे यहां आया हूं तबसे इन बनमें मनुष्यका तो जिक्र क्या है कोई पक्षी भी नजर नहीं आया, तब फिर उस ब्राह्म- णने कहा कि देखूं तेरा पांव, यह सुनकर पांव उसने आगे रख दिया, और ब्राह्मण सब चिन्ह देख देखकर अपने जीमें कहने लगा कि, यह सबब क्या है कि सब लक्षण इसमें

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