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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १२६ ) सिंहासनबत्तीसी.

आये. पर चंद्रमा नहीं आये. अपने जीमें विचार बैतालपर सवार हो चंद्रलोकको गया. वहां जा सन्मुख हो दंडवत् की और हाथ जोड़ कर कहा-स्वामी ! मेरा क्या अपराध है ? जो अपने कृपा न की और सबने मेरेपर कृपा की है. बिना तुम्हारे मेरा काम आधा है अब काम मेरा सुधारिये. आपको धर्म होगा. तुम्हें संसारमें यश और कीर्ति मिलेगी. जो कदाचित् आप इसमें विलंब कीजियेगा तो मैं हत्या दूंगा. तब चंद्रमाने हँसकर कोमल मधुर बचनसे कहा-राजा ! मैं तुझसे सत्यकर कहताहूं तू अपने जीमें उदास न हो. मेरे आनेसे संसारमें अंधकार होजायगा. इस लिये मेरा आना नहीं बनता. तुझे अभिलाषा थी मेरे दर्शनकी सो तेरी इच्छा पूरी होगई. और तेरा काम सुफल होगा. तू अपने नगरमें जा. जो काम तूने आरंभ किया है सो पूर्ण कर. इस तरहसे राजाको समझा अमृत दे विदा किया. राजाने शिर चढ़ाले लिया, और दंडवत् कर अपने नगरको चला रास्तेमें देखा कि यमराजके दो दूत एक ब्राह्मणका जीव लिये जाते हैं. राजाने वह देवदृष्टिसे जाना और उस ब्राह्मणके जीवने राजा- को देख दूतसे कहा कि-इस राजाको भेटना है. राजाने उस ब्राह्म- णकी आवाज सुनकर कहा कि-भाई तुम कौन हो ? तब उन दोनोंने समझाकर राजासे कहा कि-हम यमके भेजेसे उज्जैन नगरीको गये थे. ब्राह्मणका जीव लेकर अपने स्वामीके पास जाते