भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 190 में से

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हैं. राजाने उससे कहा पहले उस ब्राह्मणको तुम हमें दिख दो और पीछे अपने कामको जाओ. वे दूत राजाको साथ ले नगरमें गये. जहां उस ब्राह्मणका देह पड़ा था वहां दिखाया. राजा देखतेही उस ब्राह्मणका शीश निहुबा अपने मनमें कहने लगा कि, यह तो हमाराही पुरोहित है. तब राजाने दूतोंको बाताम लगा नजर बचा वह अमृत उसके मुँहमें डाल दिया. ब्राह्मण रामका नाम ले उठ खडा हुआ. ब्राह्मणने राजाको प्रमाण कर- तेही आशीष दिया और दूतोंसे हाथ जोड विनती कर कहा कि—यह जीवदान मैंने तुमसे पाया. यह देखकर दूतोंने अपने जीमें अचंभा किया कि अब हम जाकर क्या जवाब देवेंगे ? यह विचार करते हुए दूतोंने यमराके पास जा सब राहकी अवस्था कही. यम सुनकर चुप होरहा और राजा ब्राह्मणका हाथ पकड अपने मंदिरको लाया. और बहुतसा दान दे उसको बिदा किया. यह कथा सुनाकर चंद्रज्योति नाम पुतली बोली कि, हे राजा भोज ! ऐसा पुरुषार्थ तू कर सके तो आसनपर बैठ नहीं तो उसके खयालसे दर गुजर, इस तरहसे सुन राजा वहांसे उठ अपने मंदिरमें आया. रात तो जिस तिस तरहसे काटी. सुबह होतेही स्नान ध्यान कर तैयार हो फिर सिंहासनके पास जा खडा हुआ. चाहता था कि उठकर पांव धरें तब अनुरोधवती नामवाली—

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