सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextधुन २ कर कहताथा कि, राजा भी मूर्ख है और उसकी सभा भी मूखोंकी है जो बिचार नहीं करती. यही बात पांच सात दफे कही. द्वारपाल खफा हो ब्राह्मणको देख राजाके डरो कुछ कह तो न सके पर राजाके सम्मुख जा हाथ जोडकर खडे हुए. महाराजने जो उनकी तरफ देखा तब उन्होंने विनती करके कहा कि,-महाराज ! द्वारपर एक ब्राह्मण विदेशी दुर्बल आन बैठा है! शिर डुला डुलाकर बैठा है और कहता है कि, वह राजा और उसकी सभाके लोग अति मूर्ख हैं, जो गुण विचार नहीं करते. तब राजाने उन द्वारपालोंसे कहा कि, जाकर उसे पूछो उनको मूर्ख तूने किस लिये कहा ? उन्होंने राजाके आज्ञा पाय पौरपर आय ब्राह्मणसे पूछा-महाराजने आज्ञा की है कि, उनके गुणमें दोष कौनसा है ? वह तुम बताओ तो हम तुम्हारी बात सच जाने. उसने कहा-बारह आदमी चार चार तीन तरफमें खडे हुए जो मृदंग बजाते हैं तिनमेंसे पूर्व मुखवालोंमें एक मृदंगीके अँगूठा नहीं है इसके समपर थाप हलकी पडती है इससे मैने सबको झूठ कहा है. न मानो तो तुम जाकर यह सच है या नहीं सो देखो वे दौडे हुये राजाके पास आये और सब बाते राजासे सुनाई. तब राजाने पूर्वमुखके चारों मृदंगियोंको बुला एक एकका हाथ देखलिया उनमें एकका अँगूठा मोमका बनाकर