सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
धुन २ कर कहताथा कि, राजा भी मूर्ख है और उसकी सभा भी मूखोंकी है जो बिचार नहीं करती. यही बात पांच सात दफे कही. द्वारपाल खफा हो ब्राह्मणको देख राजाके डरो कुछ कह तो न सके पर राजाके सम्मुख जा हाथ जोडकर खडे हुए. महाराजने जो उनकी तरफ देखा तब उन्होंने विनती करके कहा कि,-महाराज ! द्वारपर एक ब्राह्मण विदेशी दुर्बल आन बैठा है! शिर डुला डुलाकर बैठा है और कहता है कि, वह राजा और उसकी सभाके लोग अति मूर्ख हैं, जो गुण विचार नहीं करते. तब राजाने उन द्वारपालोंसे कहा कि, जाकर उसे पूछो उनको मूर्ख तूने किस लिये कहा ? उन्होंने राजाके आज्ञा पाय पौरपर आय ब्राह्मणसे पूछा-महाराजने आज्ञा की है कि, उनके गुणमें दोष कौनसा है ? वह तुम बताओ तो हम तुम्हारी बात सच जाने. उसने कहा-बारह आदमी चार चार तीन तरफमें खडे हुए जो मृदंग बजाते हैं तिनमेंसे पूर्व मुखवालोंमें एक मृदंगीके अँगूठा नहीं है इसके समपर थाप हलकी पडती है इससे मैने सबको झूठ कहा है. न मानो तो तुम जाकर यह सच है या नहीं सो देखो वे दौडे हुये राजाके पास आये और सब बाते राजासे सुनाई. तब राजाने पूर्वमुखके चारों मृदंगियोंको बुला एक एकका हाथ देखलिया उनमें एकका अँगूठा मोमका बनाकर
लगाया गयाथा, यह तमाशा राजा देख बहुत प्रसन्न हुआ और ब्राह्मणको ऊपर बुलाया, वह जाकर सम्मुख हुआ तब राजाने दंडवत् किया और उसने आशीष दी. फिर शिष्टाचार कर गद्दीपर बिठाया, जैसे वस्त्र आभूषण आप पहने थे वैसेही मँगवाकर ब्राह्मणको पहनाये और कामकंदलाको बुलाकर आज्ञा की कि, यह महागुणी है इसलिये इसके आगे अपना गुण तू प्रकाश कर कि जिससे यह प्रसन्न होवे. कामकंदला राजाकी आज्ञा पाय अपना गुण जाहीर करने लगी. उसने संगीत नृत्यका आरंभ किया. रंगके सीसे भरे हुए सीसपर धर मुँहसे मोती पिरोती हुई हाथोंसे बले उछालती हुई और सब साज स्वर मिलाये हुई नाचती थी. इसमें फूलोंकी और अतरकी खुशबू पाकर एक भौंरा उडता हुआ आकार उसके कुचकी विटनीपर बैठा और डंक मारा, उसके बदनमें पीर हुई तब बिचारा कि, जो कुछभी हरकत करती हूं तो तालभंग होगा और मेरे गुणकी हँसी हो जायगी. इतना जीमें सोच भें- डार बिचारकर श्वास कुचकी राह निकाली. पवन लगतेही वह भौंरा उड़गया. तब माधव उस गुणको देखतेही मोहित होकर बोला कि,-हे सुंदरी ! धन्य है तुझे और तेरे करतबको. यह कहके प्रसन्न होकर वस्त्र और आभूषण जो राजाने दियेथे वह सब उतार उसको दिये यह देख राजा और मंत्री आपसमें
कहने लगे कि, देखो इस ब्राह्मणने क्या मूर्खता की है. इस वेश्याको ये कपडे और तमाम जबाहिर एक आनमें बख्स दिया यह जातका भिखारी यहा हमारे आगे सखावत दिखाता है. तब राजाने खफा हो ब्राह्मणसे पूँछा कि-तू इसके किस गुणपर रीझा वह मेरे आगे बयान कर. ब्राह्मणने कहा-सुन, राजा ! तूभी मूर्ख है और तेरी सभाभी मूढ है. तेरी सभामें यह ऐसा गुण प्रकाश करे सोभी कोई नहीं जानता; क्योंकि इसके कुचपर भौंरा आन बैठाथा सो इसने अपनी श्वास रोक कुचकी राह निकाल उसे उड़ा दिया. यह इसका चतुरताका काम देख सब कुछ मैंने इसे बख्स दिया. माधवने जब यह बात कही तब राजा लज्जित हो बोला कि-इसी समय मेरे नगरसे निकलजा अब जो सुनूँगा कि तू इस नगरमें है तो मैं बँधवाकर दरियामें डूबा दूंगा, तब माधवने कहा, महाराज ! मुझसे ऐसा क्या- अपराध हुआ है ? जो आप मुझे देशसे निकाले देते हो. राजाने कहा, मैंने जो कुछ तुझे दियाथा सो तूने मेरेही आगे दान कर दिया. क्या मेरे पास देनेको कुछ तुझे न था, जो तूने दिया ? यह सुनकर माधव मनमें मलीन हो राजसभासे निकल बाहर जा एक वृक्षके नीचे व्याकुल खडा होकर अपने जीमें कहने लगा कि, माता बेटेको विष दे और पिता पुत्रको बेंचे और राजा सर्वस्व ले तो कोई शरण किसकी ले ? फिर कहने लगा
( १३२ ) सिंहासनबत्तीसी. कि, राजाने मुझे निकाला अब मैं कहा रहूं, यों अनेक भाँतिकी चिंताकर कामकंदलाका नाम लैले रोताथा. और इधर काम कंदलाभी राजासे बहना करके बिदा हुई और एक आदमी दौड़ाया कि यह ब्राह्मण बाहर जाने न पावे उसे ढूंढ ले जाकर मेरे मकानमे बिठा, वह आदमी गया और ब्राह्मणको ले जाकर कामकंदलाके मंदिरमे बिठा दिया. इधरसे यह भी तुरत जा पहुंची. और वह दोनों आपसमें बैठकर प्रेमकी बाते करने लगे तब उस ब्राम्हणने कहा-मुझे राजाने देशसे निकाल दिया है और तूने अपने घरमे बुला बिठलाया; जो यह बात राजा सुनेगा तो मेरा प्राण पहिलेही जायगा. इससे में तो दुःखसे छुटूंगा पर तुझेभी राजा अतिकष्ट देगा इसमें ऐसी बात करनी उचित नहीं है कि अपनी तो जान जाय और जगमें हँसाई होय इसवास्ते प्रेम जो है सो दुःखकी खान है, जिसने प्रेमके पँडेमें पाँव दिया उसने कभीही सुख न पाया. ये बातें माधवके मुखसे सुनकर कामकंदलाने कहा कि, अब तो मै इस पंथमे आई जो कुछ करे सो भगवान् है इतना कह सब साज बाज घरसे मँगवाकर अपनी विद्या जाहीर करने लगी जितनी विद्या उसे याद थी उतनी ही जब प्रकाश कर चुकी तब माधवने उन्हें यंत्रोंके साथ अपने पास जो गुप्त था सोही सब प्रकाश करके दिखाया. जब रात थोडीसी रहगई तब
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३३ )
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३३ )
कामकंदलासे कहा कि-महाराज ! तुमने तो श्रम बहुत किया अब चलकर आराम कीजिये. यह कह माधवको रंगमहलमें ले गई और जितनी खुशी थी सो सब की, जब की. जब सुबह हुआ तब दोनोंके जीमें राजाकी बात याद आई और सुध बुध जाती रही. तब घबराकर माधवने कहा कि-सुन सुंदरी ! रात तो आनंदमें कटी और अब जो मे यहां रहूंगा तो दोनोंके प्राण जाँयगे इसवास्ते अब कुछ यत्न कीजिये, जिससे निर्द्वंद्व आनंदमें रहेंगे. मैंने एक बात जीमें विचारी है. अब मे यहांसे पहले जाउँ और कुछ उपाय कर फिर आकर तुझेभी यहांसे ले जाऊंगा. तू अपना जी मजबूतसे रखना. मैं जरूर आकार तुझसे मिलूँगा. यह बचन मैं तुझे देकर जाताहूं इतनी बातें सुनतेही वह तो मूर्च्छा खाके गिर पड़ी और माधवने उठकर राह ली. और वहांसे निकलके वन वन फिरने लगा. और हाय कामकंदला ! हाय कामकंदला ! करने लगा. इधर उसेभी सखियोंने गुलाबका नीर छिड़ककर उठाया. जब कुछ होश आया तब वह भी माधव माधव पुकारने लगी और खाना पीना सब त्याग किया बहुतेरा सखियों समझाती थीं पर उसके जीमें एक न आती थी. ज्यों ज्यों गुलाब वा कपुर चंदन लालाकर लगाती थीं, त्यों त्यों दाह चौगुनी बढतीथी. किसी तरहसे शीतलता न होती थी. जब कोई माधवका नाम और गुण सुनाताथा तभी
( ११४ ) सिंहासनबत्तीसी. उसे जरा आराम आताथा. उधर माधवभी गटक भटक अपने जीमें विचारने लगा कि, अब संसारमें कौन है ? जिसके निकट जाइये जो हमारा दुःख दूर करे. तब उसमेंही उसे याद आया कि, आजतक हम सुनते हैं कि राजा वीरविक्रमादित्य परदुःखनिवारक हैं भला उसके पास जाइये और देखिये कि लोग सच कहते है या झूठ ! यह मनमें विचार कर उज्जैन नगरीको चला गया और वहां जाकर लोगोंसे पूँछा कि, वहां राजाकी भेंट आधीन की क्योंकर होसकती है ! तब उस नगरका वासी बोला कि-गोदावरी नदीके किनारे शिवजीका मठ है, उस मठमे राजा शिवजीके दर्शनको नित आता है, वहां तू जा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा. यह सुनकर वह गया और उस मठके द्वारेकी चौखटपर लिखा कि, मैं ब्राह्मण विदेशी अतिदुःखित हूं. और बिरहसे व्याकुल हो तुम्हारे नगरमें आया हूं. यह सुनकर कि राजा परदुःखनिवारक है. और जो यह दुःख मेरा जायगा तोही मैं अपना प्राण रखूंगा नही तो तीसरे दिन गोदावरीमे प्राणत्याग करूंगा. यह विचार मुकर्रर जीमें मैने ठहराया है कि तुमराजा हो और सदा गौब्राह्मणकी रक्षा करते आये हो और अबभी करोगे. इस वास्ते मैंने अपने मनकी बात सब प्रकाश कहदी है. इतनी बातें कह पुतलीने राजा भोजसे कहा कि-सुन राजाभोज !
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ )
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ ) राजा बीरविक्रमादित्यका यह नियम था कि, अन्नदुःखी, वस्त्र- दुःखी द्रव्यदुःखी, भूमिदुःखी, विरहदुःखी, और किसी तरहका दुःखी नगरमें आवे तो राजा सुनकर जबतक उसका दुःख न मिटा देता तबतक जलका तो क्या जिक्र है ! पर त- म्बूनभी न चीरताथा. सबेरे गजा महादेवजीके दर्शनको गया तो दर्शन कर परिक्रमा करने लगा. जब राजा ऊंची दृष्टि करके देखे तो कोई दुःखी अपने दुखकी अवस्था लिख गया है राजाने सब बाँच महादेवजीको दंडवत् कर मंदिरमें आया और सेवकको आज्ञा की कि, माधवनाम ब्राह्मण हमारे नगरमें आया है इसवास्ते जो कोई उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य पावेगा ऐसा कहा. यह सुन लोग नगरमें ढूँढनेको निकले. घाट घाट टोला महल्ला, बा बगीचे सब नगर ढूँढ फिरे कहीं ठिकाना उसका न पाया. तब राजाने एक दूतीको बुलाकर आज्ञा की कि, जो तू उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य पावे. उसने कहा महाराज ! यह क्या कठिन बात है अभी जाकर ढूँढ लाती हूं यह कह उसने लिखाथा वहां जाकर मंदि- रके पास बैठ रही सांझसमय वह भी भटकता हुआ आन पहुँचा. उसने उसे देख मनमें विचारा कि, हो नहो यह सच विरही है किसलिये कि, मुंह पीला आसूं जारी तन क्षीण मन मलीन हो रहा है. यह तो यही विचार कर रहीथी कि, वह ब्राह्मण
( १३६ ) सिंहासनबत्तीसी. जहां आय और एक बार हाय कामकंदला, हाय कामकंदला ! पुकार उठा. चट उसने जा उसका हाथ पकड लिया और कहा मै तेरे ढूंढनेके लिये राजाकी आज्ञा पायके आयी तू उठ मेरे साथ जल्दी चल तेरा मनोरथ होगा. तेरे दुःखसे राजा निपट निपट दुःखी है यह सुनतेही उसके साथ वह होलिया. उसे ले यह दूती राजाके सम्मुख आई और कहने लगी कि, हे महाराज ! यह वही वियोगी है जिसके लिये आपने यह दुःख पाया है. तब राजाने उस ब्राह्मणसे पूंछा कि, महाराज ! आप वियोगसे किससे व्याकुल हो रहे हो सो सब बात मेरे आगे कहो तब उसने एक आह भरकर कहा-महाराज कामकंदला वियोगसे मेरी यह गती हुई हे वह राजा कामसेन पास है तू धर्मात्मा है और मैं तेरे पास आया हूं. तू मुझे उसको दिला दे तो मेरी जान बचेगी. यह बात सुनतेही राजा हँसकर बोला-सुन विप्र ! वह तो वेश्या है तूने उसके प्रेममें अपना सब धर्म कर्म छोड़ दिया यह तुझे उचित नहीं है. तब माधवने कहा महाराज ! प्रेमका पंथ न्यारा है जो नर प्रेम करते है सो अपना तन मन धर्म कर्म सब समर्पण करते है, प्रेमकी कहानी तो अकथनीय है यह मुझसे नहीं कही जाती. राजाने ये बाते सुनी और उसे अपने साथ ले मदिरमें गया और सब रानियोंके आज्ञा की कि, तुम
इकीसवीं पुतली २१. (१३७)
इकीसवीं पुतली २१. (१३७)
बनाव सिंगार करके आओ. रानियां जब सिंगार कर आई तब उस विप्रसे राजाने कहा इनमेंसे जिसे तुम्हारी इच्छा होगी उसको लो और अपने मनमें दुःख न कर चैन करो. तब उसने जवाब दिया कि, महाराज ! मैं आपके आगे सत्य कहताहूं कि मेरी आंखमें वह बस रही इस लिये और कुछ मेरी दृष्टिपे नहीं आता. चातककी तृषा स्वातीके बूँदसे बुझती है और जलपर उसे रुचि नहीं वैसी है प्रेमकी दृढता. यह दृढता विप्रकी देख राजाने अपने मनमें बिचार किया कि इसे साथ ले जाकर काम- कंदलाको दिलाऊं. अन्यथा इसके मनको स्थिरता नहीं होगी. यह बात राजाने बिचार विप्रसे कहा. देवता ! तुम स्नान पूजा कर कुछ खाओ. तब तलक मैंभी अपने लोगोंको बुला तुझे साथ ले चलूंगा. और उसे तुझे दिलाऊंगा तू अपने मनमें किसी बातकी चिंता मत्कर मैने तुझसे यह बचन किया. तब विप्र अपने खाने पीने लगा और राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, मेरे डेरे नगरके बाहर निकालो चार घडीके बाद कामनगरकी तरफ मेरा कूच है इस वास्ते सबको खबर दो. इसमें कितनी एक देरके पीछे राजाभी तैयार हो विप्रको साथ ले कूचकर डेरोंमें जा दाखिलाआ. और जितने राजाके नौकर थे वह सब रिका- बमें हाजिर थे राजा वहांसे कूच दरकूच जाताथा, कितने एक मंजिलोंके बाद कामा नगरी दस कोस इधर डेरा किया.
( १३८ ) सिंहासनबत्तीसी.
और उस राजाको पत्र लिखा कि हम इस लिये आये हैं कि, तुम्हारे यहां जो कामकंदला वेश्या है उसे हमारे पास भेजदो. नहीं तो युद्ध करनेका सामान करो. यह पत्र लिख एक दूतके हाथ राजा कामसेनके पास भेज दिया राजाको खबर हुई कि, एक दूत राजा वीरविक्रमादित्यका खत लेकर आया है यह सुनतेही राजाने उसको सन्मुख बुलाया और उसने जा जुहार- कर खत राजाके हाथमे दिया. राजाने उस चिट्ठीको बाँचकर कहा कि, अच्छा कहो अपने राजासे कि चले आवे हम युद्ध करनेको तैयार .हुए हैं. दूतने आ राजासे कहा-महाराज ! वह लडनेको तयार है. तब राजाने भी हुक्म अपने लोगोंको दिया. हमाराभी दल तैयार हो फिर राजाके जीमें आया कि जिसके वास्ते हम आये है उसकी प्रीतिकी परीक्षा लिया चाहिये. इस तरह जीमें ठहराया, और आप वैद्यका स्वांग बन कामनग- रीमें गया और लोगों मकान कामकंदलाका पूंछ दरवाजे- पर जा वैद्य हकीम कर पुकारा. इनका अवाज सुनतेही एक दासी बाहर निकल आई और पूंछा कि तुम वैद्य हो तो हमारी नायकाका कुछ इलाज करो जो यह अच्छी होवेगी तो तुम्हें बहुतसे रुपये मिलेंगे. ये बातें कह दासी उससे विदा हो गई और वह उसके साथ कामकंदलाके सन्मुख गया राजाने देखा कि निर्जीव पडी है. राजाने उसकी नाडी देखकर कहा कि
इक्कीसवीं पुतली २१. ( ११६ )
इक्कीसवीं पुतली २१. ( ११६ )
इसके तई रोग और कुछ नहीं इनके तो प्रियतमका वियोग है जिससे इसकी यह गति बनी है. यह बात सुन कामकंदलाने आँखें खोल उसकी तरफ देखा. और कहा कि-इसका कुछ इलाज तुम्हारे पास होय सो करो. तब उसने कहा कि, इसका इलाज तो था पर इसमें हमें कुछ कहते बन नहीं आता. तब वह बोली-तुम्हारे पास इलाज क्या था ? वह बताओ राजाने कहा-माधव नाम एक ब्राह्मण था उसे हमने उज्जैन नगरीमें विरहवियोगी अति शोकी देखा. सो वह दुःख उपाय मर गया यह सुनतेही हाय कर उसने भी अपना प्राण छोड़ दिया. जितनी दासी दारा उनके घरमें थे. यह दशा देख सिर पीट पीट सब रोने लगे. तब उन्होंने कहा कि-तुम कुछ चिंता अपने मनमें मत करो. इसे मूर्च्छा आई है कितनी देरमें सुध आवेगी तुम इसकी चौकसी करते रहो मैं जाकर अपने घरसे घरसे औषध लाऊ ऐसा कह राजा उलटा फिर अपने दलमें आया और माधवके आगे उसके मरनेकी खबर कही. सुनतेही एक आहके साथ उसकी भी जान निकल गई, यह देखकर राजा अपने जीमें पछताया. विचार करने लगा कि जिसके वास्ते इतनी सेना साजके साथ परभूमिमें आया और इसे इस तरह खो दिया. यह हत्या मेरेपर हुई. अब अपना भी प्राण रखना उचित नही यह बात जीमें ला बहुतसा चंदन मंगवा चिता बनाय राजा
( १४० ) सिंहासनबत्तीसी. जीताही जलनेको तैयार हुआ. दीवान और प्रधानने कितना मना किया पर न माना जो चाहे कि उस चितामे बैठकर आग लगावे कि बैतालने आ हाथ पकड़ लिया और कहा कि- हे राजा ! तू अपना जी क्यों देता है ? तब इसने कहा कि-दो की जान मैंने जानके खोई अब मेरा भी जीना संसारमें उचित नहीं इस बदनामीके जीनेसे मरनाही उत्तम है, तब बैतालने कहा कि-राजा मैं अमृत लाकर देताहूं- तू दोनोंको जिलादे यह कह जल्द बैताल पातालमें जाकर अमृत लेकर आया और उस ब्राह्मणपर छिड़काया तब वह उठा फिर ले जाकर कामकंदलापर छिड़का वह जी उठी और माधव माधव पुकारने लगी. राजाकी सूरत देखकर कहा कि महाराज ! तुम कौन हो और कहाँसे आये सो मुझसे कहो तब राजाने कहा-हम बीर विक्रमादित्य हैं और माधवका बिरह दूर करनेके लिये उज्जैन नगरीसे यहां आये हैं तुम अपने मनमें खातिर जमा रक्खो कि तुम्हें हम माधवसे मिला देंगे. यह बात राजाके मुखसे सुनते ही वह उठ राजाके पांवपर गिरपड़ी और बोली कि-महाराज ! यह तुम जीवदान दोगे. और जैसा तुम्हारा यश सुनतीथी वैसा ही दृष्टिमें आया इतनी बात कह राजा वहांसे फिर अपने लश्करको आय मिला. दूसरे दिन अपनी फौज ले कामनगरी पर चढ़ धाये वहांके राजासे युद्ध कर उसको जीता. तब उस
[Header: बाईसवीं पुतली २२. ( १४१ )]
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राजाने हार मानी और कबूल किया कि, हम कामकंदलाको भेज देंगे. और यह जो हमने युद्ध किया सो आपके दर्शनके वास्ते किया है इसलिये कि किसीतरह हमारे नगरमें आपका चरण पड़े आगे राजासे मुलाकत करके वह राजा अपने मंदिरमे विक्रमादित्यको लेगया. और बहुत भेंट आगे धर कामकंद- लाको बुलाकर राजाके आगे खड़ी किया. और उसनेभी माधवको बुला कामकंदलाका हाथ पकड़ हवाले किया. फिर वहासे कूचकर अपने नगरमें आये और माधवको बहुत धन दौलत दे विदा किया. इतनी बातें कह अनुरोधवती पुतली बोली कि-हे राजा भोज ! इतनी सामर्थ्य और इतना साहस जो तुझमे हो तो सिंहासनपर बैठ नही तो पतित हो नरक भोग करेगा. पहभी दिन राजाका टल गया. दूसरे दिन वह फिर मौजूद हुआ तब अनुरेखा नाम्नी-
बाईसवीं पुतली-
बोली-कि हे राजा भोज ! तू अपने मनकी चिंता छोडदे और मैं जो तेरेसे कहतीहूं सो सुन. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य सभा कर बैठाथा और प्रधानसे पूंछा कि-मनुष्य बुद्धि अपने कर्मसे पाते हैं या उनके मातापिताके सिखानेसे पाते हैं ? यह सुनकर मंत्री बोला-महाराज ! यह नर पूर्वजन्ममें जैसा कर्म
( १४२ ) सिंहासनबत्तीसी. करता है वैसा विधाता उसके कर्ममें लिख देता है, तिसी प्रमाण बुद्धि होती है, मातापिताके सिखाये बुद्धि होती नहीं. कर्म लिखवाही फल पाता है, आदमी आदमीको क्या सिखावे ? और जो सिखेसे बुद्धि हो जाय तो सभी पंडित होजाते इससे महाराज ! कर्मके लिखे बिना विद्या होती नहीं. करोड यत्न कोई करे पर कर्मकी रेखा मेटे मिटती नहीं. राजाने कहा-ऐ दीवान ! तूने यह क्या कहा ? संसारमें यह जो जाहिर देखते हैं कि जन्म लेतेही लडका मातापितासे जो सुनता है और जो देखता है उसी व्यौहारसे चलता है ? इसमें कर्मका लिखा क्या है ? यह सिखायेसे सीखता है. ओर जैसो संगमें बैठता है वैसीही उसकी बुद्धि होती है. इतनी बात सुन मंत्री बोला कि-धर्माव- तार ! आपकी बराबरी हम नहीं करसकते, यह अपने मनमें विचारके तुम समझो कि कर्मका लिखा हुआ फल मिलता है. तब राजाने कहा-अच्छा इस बातकी परीक्षा लिया चाहिये. ऐसा कह राजाने एक महावनमें मंदिर बनवाया कि जहां मनुष्यकी आवाजही नहीं जाय. एक अपने बेटेको पैदा होतेही उस मंदिरमें भिजवा दिया. और उसके साथ एक दाई ऐसी कर दी कि, आँखोंसे अंधी, कानोंसे बहिरी और मुँहसे गूँगी. वही उसको दूध पिलातीथी. और परवरिश करतीथी. फिर इसी तरहसे एक दीवानके बेटेको, एक ब्राह्मणके सुतको, एक कोत- बालके पुत्रको जन्मतेही गूँगी, बहरी अंधी दाइयां दे उसी
बाईसवीं पुतली २२. ( १४३ )
बाईसवीं पुतली २२. ( १४३ )
मंदिरमें भिजवा दिया. दिन बदिन वे बढ़ने लगे और ऐसी गार्द चौकी उस मंदिरमें दोदोकोस गिर्दमें बैठादी कि मनुष्यके जानेकी तो क्या सामर्थ्य थी ? ढोल नकारेकीभी आवाज न जातीथी. इसतरहसे बारह बरस जब बीतगये तब एकदिन ब्राह्मणीने अपने स्वामीसे कहा कि--एक युग पुरा होचुका और मैंने अपने पुत्रका मुँह नहीं देखा कदाचित् जी निकल जाय तो मनमें देखनेकी अभिलाषा रहजाय इससे तुम अब राजाके निकट जाकर कहो, कि--महाराज ! बारह बरस बीत गये पर मैने बेटेका मुँह नहीं देखा अब मेरे जीमें है कि, पुत्रको घर सौंप- कर दंडी हो तपस्या करूं. यह ब्राह्मणकी बात सुन ब्राह्मण तैयार हो राजाके पास गया. राजाने देखतेही दंडवत् की और उस ने भी आशीष दी राजा बोला--तुम आनंद मंगलसे हो ? ब्राह्मणने कहा कि--महाराज ! आपकी कृपासे सब आनंद मंगल है पर मैं एक कामनाकर आपके पास आयाहूं. यह सुनकर राजाने कहा कि--जो तुम्हारा काम हो सो कहो. तब उस ब्राह्मणने अपना सब अहवाल कहा. सुनतेही राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, उन चार बालकोंको मंगाओ जिसको कि बारह बरस होचुके. दीवान सुनतेही तुर्त आप सवार हो लडकोको लेने गया. पहले उनमेंसे राजकुँवरको ले आया. नख और केश बढे हुए, शरीर तमाम मैला कुचैला इस भेषसे राजाके सम्मुख ला खडा किया.
( १४४ ) सिंहासनबत्तीसी. तब राजाने देखकर कहा कि, सुत ! तुम कुशलहो ? इतने दिन तुम कहां थे ? और अब कहांसे आये ? सब ब्यौरा अपना हमसे समझाकर कहो. यह सुन कुँवरने हँसकर राजासे कहा कि, आपकी कृपासे सब कुशल है और आजका दिनभी कुश- लका है जो आपके दर्शन पाये. यह कुँवरकी बात सुनकर अपने मनमे हर्षित हो राजाने मंत्रीकी तरफ देखा तो मंत्री उठ हाथ जोडकरके बोला कि,-महाराज ! यह सब कर्महीका लिखा है. फिर दीवानके पुत्रको बुलवाया, वह आकर राजाके सम्मुख भयानक भेषसे खडा हुआ. जैसे बनसे भालूको पकड लाते हैं. मुखपर बाल उसी तरह बढे हुए शर्मसे नीचीगर्दन किये खडा था. तब उसको राजाने कहा कि-तुम अपनी कुशल कहो कहां थे ? और किधरसे आये हो ! तब वह बोला, महाराज ! कुशल क्षेम कहां होगी ? उधर संसारमें उपजे हैं इधर विनसे हैं जैसे घडी भरती ओर डूब जाती है नर जानता है ! दिन जाने हैं पर नर जाता है. यही जगत्का व्यौहार है. इससे कुशल क्षेम काहेकी कहूं ? ये उसकी बातें सुन राजाने दीवानसे कहा-इसे यह किसने सिखाया है ? जो कुछ तूने कहाथा वह सब सच है. यह फल कर्मसेही इसने पाया. फिर राजाने कोत- वालके बेटेको बुलवाया. उसने आतेही राजाको सलाम किया और हाथ जोड खडा हुआ राजाने कुशल पूंछी. तब उसने-कहा
बाईसवीं पुतली २२. ( १४५ )
बाईसवीं पुतली २२. ( १४५ )
पृथ्वीनाथ ! दिनरात नगरका पहरा हम देते हैं. इसमें भी चोर आन चोरी करता है, बदनाम हम होते हैं. बिना अपराध कलंक लगे तो फिर कुशल काहेकी है ? राजाने फिर ब्राह्मणके बेटेको बुलाया. जब वह सन्मुख आया तब राजाने दंडवत् की. वो मंत्र पढ आशीष देने लगा. तब राजाने कहा आप कुशल क्षेमसे हैं ? उसने कहा महाराज ! आप पूंछते हैं मुझसे यह बात कि तेरे शरीरमें कुशल है सो कुशल कहांसे हो ? मेरे शरीरकी दिन बदिन उमर घटती है महाराज ! कुशल तो तब कहनेमें आवे कि मनुष्य चिरंजीव होवे जिसके जीवन मरण साथ है उसको क्या खुशी है ? चारोंकी चार बातें सुनकर दीवानसे कहा कि सच है. पढानेसे पंडित नहीं. पंडिताई जो कर्ममें लिखी हो तो मिलै यह कह दीवानके तईं सब प्रधानोंका सरदार किया और अपने राजका भार दिया. उन चारों लड़कोंके विवाह कर दिये. ओर बहुत धन दौलत दी इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! कलियुगमें ऐसा धर्मात्मा और साहसी राजा होना कठिन है जो इतनी बुजुर्गी और धन पाय अपनी कही बातका ख्याल- न करे और जो न्यायका धर्म था सोही कहे. ऐसा जो तू कर्म करे और इसके योग्य हो तो इस सिंहासनपर पाँव धर और नहीं तो अपनी यह आशा तज. यह पुतलीकी बातें सुन राजा अ पने मनमें चिंता करता हुआ वहांसे उठ मंदिरमें आया और १०
तेईसवीं पुतली २३. (१४७)
तेईसवीं पुतली २३. (१४७)
पुरुषार्थ था यह सुनकर करुणावती पुतली बोली राजा ! जो तुम स्थिर होकर बैठो और कान देकर सुनो तो मैं सब कथा कहती हूँ. तब राजा यह बात सुन प्रसन्न हो आसन बिछवा वहां बैठगया और जितने लोग राजाके साथ थे गिर्द ओ पेश वे सब बैठगये. फिर पुतली बोली कि, राजा ! वीरविक्रमादित्यके गुण तू सुन. ऐसा यशी, साहसी और पुण्यात्मा इस कलियुगमें कोई जन्मा नहीं और न कोई जन्मेगा. जिस समय राजा वीरविक्रमादित्य शंखको मार राजगद्दीपर बैठा तब शंखके दीवानको बुलाकर कहा कि, तुझसे मेरा काम न चलेगा. इससे यह बेहतर है कि, बीस दास मुझे अच्छे ढूंढकर दे कि जो राजकाज करनेके लायक हों, क्योंकि तुझसे कामका बंदोबस्त न होगा. मैं उनसे अपना सब काम करा लूंगा. राजाकी आज्ञा सुन दीवानभी बीस आदमी उसी नगरमेंसे ढूंढकर लाया. कुलमे, उमरमें, सुंदरतामें, सबके सब अच्छे थे. उनको राजाके सामने खड़े करदिये. तब राजा उनको देखतेही बहुत प्रसन्न होगया. और उसी समय सबको बागे पहना पान देकर कहा कि, तुम हमारी खिदमतमें सदा हाजिर रहो. फिर उसके कई दिनके बाद उनमेंसे किसीको दीवान, किसीको कोतवाल, किसीको सेनाध्यक्ष किया. गरज इसी तरहमें हर एकको एक काम देकर पुराने लोगोंको जवाब दिया. और सब नया बंदोबस्त कर दिया. पर एक उस पुराने दीवानको जवाब न दिया, दीवान जब अपने घरमें बैठा करता तब वे सब
( १४८ ) सिंहासनबत्तीसी. पुराने लोग आकर हाजिर हुआ करते और आपसमें चर्चा करते कि यह राजा बुद्धिमान है, जो राजको यों लिया और बंदोबस्त यों किया, कई दिनके बात उन लोगोंसे दीवानने कहा कि, तुम मेरेपास आया न करो इस लिये कि काम तो मेरे हाथ तुम्हारा निकलता नहीं और नाहकको राजा सुनेगा, तो खपा होगा कि, यह अपने घरमें क्या मता किया करते हैं ? इस वास्ते मैं अपनी बदनामीसे डरताहूं कुछ तुम मेरे इस कहनेका अपने मनमें बुरा न मानना. यह सुनकर उनमेंसे फिर कोई उसके पास न आया, यह अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा कुछ काम कीजिये जिसमें संतुष्ट हो रैनादिन यही विचार करता रहा था. एक दिन वह प्रधान नदीके किनार गया, वहां जाकर स्नान ध्यान कर कमरभर पानीमें खड़ा हुआ जप करताथा इसमें उसे नदीमे एक फूल अति सुंदर कि वैसा कभी दृष्टीमें न आया था बहता हुआ देखा. अपना जप छोड़कर आगे बढ़ फूल लेकर जीमें विचारा कि यह राजाको भेंट करूंगा तो वह देखकर बहुत खुश होवेगा, वह फूल हाथमें ले खुशी खुशी अपने घरमें आ कपडे दरबारके पहन राजाके पास गया, और फूल नजर किया. राजा फूल लेकर खुश बहुत हो बोला कि, अपने राज पाटका मैंने तुझे प्रधान किया, उसने उठकर भेंट दी और आदाब बजालिया. फिर राजाने कहा इस फूलका वृक्ष मुझे लादे, और लादेगा तो मैं तुझसे बहुत खुश हूंगा और न लादेगा तो अपने नगरसे
तेईसवीं पुतली २३. ( १४९ )
तेईसवीं पुतली २३. ( १४९ )
निकाल दूंगा. यह राजाकी आज्ञा ले अपनी मंदिरमें आया और जीमें विचार करने लगा कि, मैने पूर्व जन्ममे ऐसा क्या पाप किया है कि जो ऐसी सुंदर खुवस्तु राजाको दी और राजाने प्रसन्न होकर ली. फिर यह क्रोध किया. कर्मकी गति बूझी नहीं जाती कि भला वारते बुरा होवे. अकेला बैठा बहुत चिंता करने लगा. कि, अगर राजाकी आज्ञा न मानू तो देशनिकाल मिले ओर ढूंढने जाऊं तो कहांसे ढूंढकर लाऊं. जो दुःख पाकर कही जाऊं और ढूँढे न पाऊं तो और भी दूना दुःख होगा. मैं यह जानता हूं कि, काल मेरे निकट आकर पहुँचा है. इससे अप- यशका मरना भला नहीं अगर योंही मरना है तो वनम जाइये जो ढूँढे मिले तो ले आइये नहीं तो वहीं मर जाइये इतनी बातें अपने जीमें विचार ढाढ़स करके बैठा अपने दीवानको बुलाकर कहा कि किसी कारीगर बढ़ईको बुलादो कि एक नाव हमें ऐसी तयार करके दे कि बगैर मल्लाह जिधरको चाहें ले जायें. कारीगर बढ़ईको बुलवा दीवानने हाजिर कर किया. बढईने कहा कि महाराज ! कुछ मुझे खर्चकी आज्ञा होवे तो मैं जल्दी बनालाऊं. मंत्रीने दीवानको कहा कि यह जितने रुपये मागे उतने इसे दो. उसने मुँहमांगे रुपये उसे दिये वह घरको ले गया और कितनेक दिनोंके बाद नाव तैयार करके खबर दी कि नाव तैयार हो चुकी. दीवाननेभी अपने स्वामीसे जाकर कहा कि, आपने जो