सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११४ ) सिंहासनबत्तीसी. उसे जरा आराम आताथा. उधर माधवभी गटक भटक अपने जीमें विचारने लगा कि, अब संसारमें कौन है ? जिसके निकट जाइये जो हमारा दुःख दूर करे. तब उसमेंही उसे याद आया कि, आजतक हम सुनते हैं कि राजा वीरविक्रमादित्य परदुःखनिवारक हैं भला उसके पास जाइये और देखिये कि लोग सच कहते है या झूठ ! यह मनमें विचार कर उज्जैन नगरीको चला गया और वहां जाकर लोगोंसे पूँछा कि, वहां राजाकी भेंट आधीन की क्योंकर होसकती है ! तब उस नगरका वासी बोला कि-गोदावरी नदीके किनारे शिवजीका मठ है, उस मठमे राजा शिवजीके दर्शनको नित आता है, वहां तू जा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा. यह सुनकर वह गया और उस मठके द्वारेकी चौखटपर लिखा कि, मैं ब्राह्मण विदेशी अतिदुःखित हूं. और बिरहसे व्याकुल हो तुम्हारे नगरमें आया हूं. यह सुनकर कि राजा परदुःखनिवारक है. और जो यह दुःख मेरा जायगा तोही मैं अपना प्राण रखूंगा नही तो तीसरे दिन गोदावरीमे प्राणत्याग करूंगा. यह विचार मुकर्रर जीमें मैने ठहराया है कि तुमराजा हो और सदा गौब्राह्मणकी रक्षा करते आये हो और अबभी करोगे. इस वास्ते मैंने अपने मनकी बात सब प्रकाश कहदी है. इतनी बातें कह पुतलीने राजा भोजसे कहा कि-सुन राजाभोज !