भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( १४२ ) सिंहासनबत्तीसी. करता है वैसा विधाता उसके कर्ममें लिख देता है, तिसी प्रमाण बुद्धि होती है, मातापिताके सिखाये बुद्धि होती नहीं. कर्म लिखवाही फल पाता है, आदमी आदमीको क्या सिखावे ? और जो सिखेसे बुद्धि हो जाय तो सभी पंडित होजाते इससे महाराज ! कर्मके लिखे बिना विद्या होती नहीं. करोड यत्न कोई करे पर कर्मकी रेखा मेटे मिटती नहीं. राजाने कहा-ऐ दीवान ! तूने यह क्या कहा ? संसारमें यह जो जाहिर देखते हैं कि जन्म लेतेही लडका मातापितासे जो सुनता है और जो देखता है उसी व्यौहारसे चलता है ? इसमें कर्मका लिखा क्या है ? यह सिखायेसे सीखता है. ओर जैसो संगमें बैठता है वैसीही उसकी बुद्धि होती है. इतनी बात सुन मंत्री बोला कि-धर्माव- तार ! आपकी बराबरी हम नहीं करसकते, यह अपने मनमें विचारके तुम समझो कि कर्मका लिखा हुआ फल मिलता है. तब राजाने कहा-अच्छा इस बातकी परीक्षा लिया चाहिये. ऐसा कह राजाने एक महावनमें मंदिर बनवाया कि जहां मनुष्यकी आवाजही नहीं जाय. एक अपने बेटेको पैदा होतेही उस मंदिरमें भिजवा दिया. और उसके साथ एक दाई ऐसी कर दी कि, आँखोंसे अंधी, कानोंसे बहिरी और मुँहसे गूँगी. वही उसको दूध पिलातीथी. और परवरिश करतीथी. फिर इसी तरहसे एक दीवानके बेटेको, एक ब्राह्मणके सुतको, एक कोत- बालके पुत्रको जन्मतेही गूँगी, बहरी अंधी दाइयां दे उसी