भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 190 में से

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बाईसवीं पुतली २२. ( १४३ )

मंदिरमें भिजवा दिया. दिन बदिन वे बढ़ने लगे और ऐसी गार्द चौकी उस मंदिरमें दोदोकोस गिर्दमें बैठादी कि मनुष्यके जानेकी तो क्या सामर्थ्य थी ? ढोल नकारेकीभी आवाज न जातीथी. इसतरहसे बारह बरस जब बीतगये तब एकदिन ब्राह्मणीने अपने स्वामीसे कहा कि--एक युग पुरा होचुका और मैंने अपने पुत्रका मुँह नहीं देखा कदाचित् जी निकल जाय तो मनमें देखनेकी अभिलाषा रहजाय इससे तुम अब राजाके निकट जाकर कहो, कि--महाराज ! बारह बरस बीत गये पर मैने बेटेका मुँह नहीं देखा अब मेरे जीमें है कि, पुत्रको घर सौंप- कर दंडी हो तपस्या करूं. यह ब्राह्मणकी बात सुन ब्राह्मण तैयार हो राजाके पास गया. राजाने देखतेही दंडवत् की और उस ने भी आशीष दी राजा बोला--तुम आनंद मंगलसे हो ? ब्राह्मणने कहा कि--महाराज ! आपकी कृपासे सब आनंद मंगल है पर मैं एक कामनाकर आपके पास आयाहूं. यह सुनकर राजाने कहा कि--जो तुम्हारा काम हो सो कहो. तब उस ब्राह्मणने अपना सब अहवाल कहा. सुनतेही राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, उन चार बालकोंको मंगाओ जिसको कि बारह बरस होचुके. दीवान सुनतेही तुर्त आप सवार हो लडकोको लेने गया. पहले उनमेंसे राजकुँवरको ले आया. नख और केश बढे हुए, शरीर तमाम मैला कुचैला इस भेषसे राजाके सम्मुख ला खडा किया.

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