भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 190 में से

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( १४४ ) सिंहासनबत्तीसी. तब राजाने देखकर कहा कि, सुत ! तुम कुशलहो ? इतने दिन तुम कहां थे ? और अब कहांसे आये ? सब ब्यौरा अपना हमसे समझाकर कहो. यह सुन कुँवरने हँसकर राजासे कहा कि, आपकी कृपासे सब कुशल है और आजका दिनभी कुश- लका है जो आपके दर्शन पाये. यह कुँवरकी बात सुनकर अपने मनमे हर्षित हो राजाने मंत्रीकी तरफ देखा तो मंत्री उठ हाथ जोडकरके बोला कि,-महाराज ! यह सब कर्महीका लिखा है. फिर दीवानके पुत्रको बुलवाया, वह आकर राजाके सम्मुख भयानक भेषसे खडा हुआ. जैसे बनसे भालूको पकड लाते हैं. मुखपर बाल उसी तरह बढे हुए शर्मसे नीचीगर्दन किये खडा था. तब उसको राजाने कहा कि-तुम अपनी कुशल कहो कहां थे ? और किधरसे आये हो ! तब वह बोला, महाराज ! कुशल क्षेम कहां होगी ? उधर संसारमें उपजे हैं इधर विनसे हैं जैसे घडी भरती ओर डूब जाती है नर जानता है ! दिन जाने हैं पर नर जाता है. यही जगत्का व्यौहार है. इससे कुशल क्षेम काहेकी कहूं ? ये उसकी बातें सुन राजाने दीवानसे कहा-इसे यह किसने सिखाया है ? जो कुछ तूने कहाथा वह सब सच है. यह फल कर्मसेही इसने पाया. फिर राजाने कोत- वालके बेटेको बुलवाया. उसने आतेही राजाको सलाम किया और हाथ जोड खडा हुआ राजाने कुशल पूंछी. तब उसने-कहा

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