भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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तेईसवीं पुतली २३. ( १४९ )

निकाल दूंगा. यह राजाकी आज्ञा ले अपनी मंदिरमें आया और जीमें विचार करने लगा कि, मैने पूर्व जन्ममे ऐसा क्या पाप किया है कि जो ऐसी सुंदर खुवस्तु राजाको दी और राजाने प्रसन्न होकर ली. फिर यह क्रोध किया. कर्मकी गति बूझी नहीं जाती कि भला वारते बुरा होवे. अकेला बैठा बहुत चिंता करने लगा. कि, अगर राजाकी आज्ञा न मानू तो देशनिकाल मिले ओर ढूंढने जाऊं तो कहांसे ढूंढकर लाऊं. जो दुःख पाकर कही जाऊं और ढूँढे न पाऊं तो और भी दूना दुःख होगा. मैं यह जानता हूं कि, काल मेरे निकट आकर पहुँचा है. इससे अप- यशका मरना भला नहीं अगर योंही मरना है तो वनम जाइये जो ढूँढे मिले तो ले आइये नहीं तो वहीं मर जाइये इतनी बातें अपने जीमें विचार ढाढ़स करके बैठा अपने दीवानको बुलाकर कहा कि किसी कारीगर बढ़ईको बुलादो कि एक नाव हमें ऐसी तयार करके दे कि बगैर मल्लाह जिधरको चाहें ले जायें. कारीगर बढ़ईको बुलवा दीवानने हाजिर कर किया. बढईने कहा कि महाराज ! कुछ मुझे खर्चकी आज्ञा होवे तो मैं जल्दी बनालाऊं. मंत्रीने दीवानको कहा कि यह जितने रुपये मागे उतने इसे दो. उसने मुँहमांगे रुपये उसे दिये वह घरको ले गया और कितनेक दिनोंके बाद नाव तैयार करके खबर दी कि नाव तैयार हो चुकी. दीवाननेभी अपने स्वामीसे जाकर कहा कि, आपने जो