सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
दशवीं पुतली १०. ( ६७ )
दशवीं पुतली १०. ( ६७ ) और बंदरके गलेमें मोतीकी माला नहीं शोभती और गधे- पर पाखर नहीं फबती, इसवास्ते मेरा कहा तू मान और इस ख्यालसे दर गुजर, नहीं तो नाहक किसीदिन मेरा प्राण जायगा. यह बात सुनकर राजा चुप रहा और वह दिनभी गुजर गया. जब रात हुई अंदेश कर सुबहको बदस्तूर सिंहा- सनके पास आया और चाहा कि, पाँव धरें, तब मेगावती- दशवीं पुतली- हँसकर बोली-हे राजा भोज ! पहले तुम मुझसे यह बात सुनलो. पीछे इस सिंहासनपर बैठो तब राजा बोला, तू कथा कह मेरा जीभी सुननेको चाहता है. राजा वहां आसन बिछाय बैठ गया. और पुतली कहने लगी-सुन राजा ! एकदिन वसंतऋतुमें टेसू फुला हुआथा. मोर मोराया हुआ कोयल कूक रहीथी. हवा चल रहीं थी. राजा वीर विक्रमादित्य अपने बागमें बैठा हुआ हिंडोल झूलताथा. इतनेमें एक वियोगी किसी देशसे भूला भटका आ निकला. राजाके पांवपर गिरपड़ा और कहने लगा कि,-स्वामी मैंने बहुत दुःख पाया और अब मैं आपकी शरण आया हूं, और उसकी सूरत बनगई थी कि तमाम लोहू बदनका सूख गया था और आँखसे कम
है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति
( ६८ ) सिंहासनबत्तीसी. सूझताथा, अन्नपाणी सब छोड दियाथा. किसी तरह धीरज नहीं धरता था. राजा ज्यों ज्यों समझाता था त्यों त्यों वह विरहसे व्याकुल हो हो रोता था. तब राजाने कहा-तू अपने जीको सँभाल और इतना दुःखी क्यो है ? और अब जो यहां आया है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति हुई है; और किसके गमसे तेरा यह शकल बन गई है ? तू किस देशसे आया है और क्या तेरा नाम है ? वह एक आह सर्द दिल पुर दर्दसे खैंचकर बोला-नगर कलंजर देश है मेरा. मैं मतिहीन ओर दुर्बुद्धि हूं. एक यतीने मेरे आगे यह बात कहीथी कि, एक खूब सूरत स्त्री एक जगह है, वैसी सुंदरी कोई जगहमें नहीं ! गोया कामदेवसे पैदा हुई है. बल्कि तीनों लोकोंमें वैसी न होगी. और लाखों राजा जी लगा उसके यहा आते हैं और जल जल जाते हैं पर, उसे नहीं पाते. राजाने पूछा-किसलिये ये जलते हैं. तब वह हकीकत कहने लगा कि-उसके बापने वहां एक आग भड़काई है, और एक कड़ाह भर घी चढ़ाकर रक्खा है. वह घी बडा खौलता है और यह उसकी शर्त है कि, जो उस कड़ाहमें स्नानकर जीता बच निकले उससे अपनी कन्याकी सादी करूंगा. यह बात उस योगीसे सुनकर मैंभी वहां गया था सो मैने अपनी आँखोंसे, वह तमाशा देख हैरान हुआ और वहां हजारों राजा देश देशके लाखों नौकर, चाकर, साथ लेकर
दसवीं पुतली १०. (६९)
दसवीं पुतली १०. (६९)
आते हैं और यह देख पछताकर जाते हैं. उनमेंसे जो इरादः कर्ता है सो उस कड़ाहमें गिरकर भुन जाता है. जब शक्ल उस राजकन्याकी नजर आई तब सुध बुध मैंने गँवाय अपनी हालत यह उसके इश्कमें बनाई है. यह बात उसके मुखसे सुनकर राजाने कहा-आज तुम यहांही रहो. कल तुम हम मिलकर वहा चलेंगे और उसे तुम्हे दिला देंगे. अपनी खातिर जमा रक्खो यह राजाकी बात सुन उसको समाधान हुआ. यह देख राजाने उसे स्नान करवा कुछ खिलाय अपनी सभामें बैठाकर यह हुकुम किया कि जितने संगीतविद्यावाले हैं सो सब तैयार हो हो आज यहां आकर हाजिर होवें और अपना अपना मुजरा बतलावें. राजाकी यह आज्ञा पायके सब आन हाजिर हुए. और अपना अपना गुण जाहिर करने लगे. राजाने उससे कहा कि-इनमेंसे जिस रंडीको तुम चाहो उस हम तुम्हें देंगे. तुम यहां बैठकर सुख भोग करो और उसका ख्याल दिलसे भुलदो. यह बात राजाकी सुनकर वह वियोगी बोला- महाराज ! सिंह अगर सात दिन उपवास करै तौभी घास न चरे. सिवाय उसके मुझे किसी औरकी इच्छा नहीं. इसी तरह तमाम रात बीत गई. जब सुबह हुवा तब राजाने स्नान पूजा कर उन बीरोंको याद किया. वे तुर्तही आन हाजिर हुआ. और अर्ज किया कि, महाराज ! हमको क्या हुकुम है ? हम
दशवीं पुतली १०. (७१)
दशवीं पुतली १०. (७१)
कूदतेही जलके राख हो गया बैतालने देखा और तुरंत अमृत ले आया और राजाके ऊपर डाला. अमृत पडतेही राजा 'राम राम' करके खड़ा हो गया. और जितने ब्राह्मण वहां थे सो सब जयजयकार करने लगे. वहां जो राजकन्या थी उसने आतेही फूलोंका हार राजाके गलेमें डाल दिया. वह जयमाला जब राजाको पहना दी तब सब लोग अचंभेमें रहगये कि, यह राजा कोई अजब तरहका आया है, जो जल गया फिर जीता उठा. यह काम मनुष्यका नहीं, यह कोई देवता है, जिसने ऐसा काम किया. राजाकी नियत पूरी है. तब उस कन्याके ब्याहकी तयारी हुई. राजाके मुल्कके जितने लोग वहां हाजिर थे वे सब खुश हुए. और मंदिरमेंभी रानियां मंगलाचार करने लगीं. इस तरह राजासे शादी कर दहेजमें " जवाहर जोड़े घोड़े, हाथी, पालकी और तमाम माल असबाब कई करोड़का दिया. यह देकर आधा राज्य संकल्प कर दिया. और दास दासीभी बहुतसे दिये. तब यह बिरही जो इसके साथ था सो देख देख बहुत खुश हुआ. जब ये सब दे ले चुके तब राजाने बिदा माँगी. उस राजाने सब असबाब और माल उस ब्याही हुई दुलहिन समेत साथ उसके कर रुखसत किया. और कहा- अपने देशको तुम जाओ. और हमपर दया माया राखियो. हमारा मुख इसलायक नहीं कि तुम्हारी कुछ तारीफ करें. जैसा साहस तुमने किया वैसा न हमने आँखोंसे देखा
[Page Header: ( ७२ ) सिंहासनबत्तीसी. ]
न कानोंसे सुना. इस कलियुगमें तुम कोई अवतार हो. एक जबानसे हमकहाँतलक तुम्हारी सिफत करसके ? एक शिर है हमारा हम तुझे क्या चढ़ावें? तुम्हारे पराक्रमपर करोड़ो शिर सदके हैं. जो नियत हमने कीथी सो तुमने पूरी कि; इसका भरोसा हमें न था कि यह इरादः हमारा पूरा होगा. राज्यकन्या हाथ जोड़कर राजासे कहने लगी-महाराज ! मेरा यह महा- दुःख आपने छुड़ाया. नहीं तो मेरे बाप ने ऐसा पाप किया था कि, आप तो नरक भोग करता और मैं सारी उमरभरही अन- ब्याही रहजाती. इतनी कथा कह पेमावती पुतली बोली की- सुन राजा भोज ? ऐसा पराक्रम करके उस कन्याको लाया और उस बिरहीको इसे देते बार न लाया. राजकन्या और सब माल असबाब बिरहीको दे दिया. और आप खाली हाथोंमे अपने मंदिरमें आ दाखिल हुआ और तू बिद्यार्थी है ऐसा साहस तुझसे न होसकेगा. यह सुनकर राजाने हैरान होकर शिर निचे कर लिया. वह साअतभी इसीतरह गुजरी. फिर दूसरे दिन राजा भोज जब सिंहासनके पास आया और चाहा कि बैठैं. तब पद्मावती --- ग्यारहवीं पुतली--- बोली-कि, हे राजा भोज ! पहले मुझसे कथा सुनले. पीछे
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७३ )
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७३ ) इस सिंहासनपर पांव दे. एक दिन राजा वीरविक्रमादित्य उज्जैन नाम नगरीको गया और अपने सब आदमियोंको बिदा कर आप वहां रातको रहा. सोता था, कि, उत्तर दिशाकी ओरसे एक रंडी हाय मार उठी और पुकार पुकार कहने लगी कि-कोई ऐसा है कि, मेरी आकर खबर ले. इस पापीसे मुझे बचावे और जीवनदान दे. दममें मरी मरी पुकार करती थी और दम चुप हो जाती थी. उसकी आवाज सुनकर राजा चौंक पड़ा. और ढाल तरवार हाथमें ले अँधेरी रातमें अकेला उठ चला. किसीको खबर न हुई. जब वनमें राजा पैठा वह सुंदरी फिर रो रो पुकार उठी, इतनेमें राजा वहां जा पहुँचा. और देखा कि वहां एक देव उस स्त्रीसे रति माँगता है और वह नहीं मानती. तब शिरके बाल पकड़ पकड़कर जमीनपर दे दे पटकता है तब राजाने कहा--अबे पापी ! तू इस स्त्रीको क्यों मारता है ? नरकसभी नहीं डरता ? राजाकी बात सुनकर फिर वह उसे मारने लगा. राजाने कहा- तू इसे छोड़दे नहीं तो अभी मैं तुझे मारताहूं. यह राजा विक्रमका वचन सुनकर वह सन्मुख होगया और गुस्सेसे घोरकर बोला--या तू भाग, नहीं तो मैं तुझे खाताहूं ? और तू कौन है ? जो यहां आकर बात करता है ? तब राजाने गजबमें आकर एक तलवार ऐसी मारी कि. शिर उसका
होतेही भाग गया, दैत्य जब भाग गया तब उस रंडीसे राजाने
( ७४ ) सिंहासनबत्तीसी.
धडसे जुदा होगया, रुड मुंडमे दो वीर निकले और राजाके दोनों हाथोंमें लिपट गये तब राजाने धीरज धर छल बलकर उनमेंसे एकको मारा, दूसरा रैन भर लडता रहा और भोर होतेही भाग गया, दैत्य जब भाग गया तब उस रंडीसे राजाने कहा-अब तू जल्दी मेरे साथ चल और कुछ जीमें अंदेसा मत कर, वह राक्षस मेरे डरसे भाग गया, फिर न आवेगा. तब वह सुंदरी बोली कि—सुनो भूपाल ! जो मैं सात द्वीप नौखंड पृथ्वीमें जहा भागकर छिप रहूंगी उससे बचने न पाऊँगी. वह आकर ले जायगा. उसके बिना मेरे जिंदगी न होगी. उसके पास एक मोहनी पुतली है वह उसके पेटमें रहती है. जहां मै छिपूंगी उसके बलसे वह ढूंढ निकालेगा. और उस पुतलीमें यह ताकत है कि, एक देव मरनेसे दूसरे चार देव बना सकती है, यह बात उसकी सुनकर राजा उसी बनमें छिपा रहा. रात होते वह देव आया उस औरतसे फिर ख्वाहिस करने लगा. जब उसने न माना और बाल शिरके पकड जमीनपर पकड़ने लगा तब वह धाड़ करने लगी. उसकी आवाज सुनतेही राजा निकट आया और उससे लड़नेको तैयार हुवा तब देवभी रंडीको छोड़ राजाके सामने होगया. चाहे कि, राजाको मारैं. इतनेमें राजाने ऐसा एक खांडा मारा कि, धडसे शिर अलग होगया. उसके धडसे वह मोहनी निकली और अमृत लेने
ग्यारहवीं पुतली ११. (७५)
ग्यारहवीं पुतली ११. (७५) चली, तब राजाने वीरोंको आज्ञा की कि वह कहीं जाने न पावे. तब वीरोंने दौड़कर उसकी चोटी पकड खैंच लिया. और राजाके सामने लाकर हाजिर किया. राजाने उससे पूछा कि तू चंपकबरनी, मृगनयनी, पिकवयनी, गजगामिनी, कटिकेहरी, चंद्रमुखी, नख- शिखसे ऐसी कि, हँसीसे तेरी फूल झडते हैं और सुगंधसे भौंरे मँडराते हैं. बतला कि, देवके पेटमें क्योंकर रहीथी ? तब वह बोली-सुन राजा ? पहले मैं शिवगण थी. पर एक आज्ञा शिवजीकी मैं चूक गई तिससे उन्होंने मुझे शाप दिया. और मैं मोहिनीरूप होगई. और इस दैत्यने महादेवकी बहुत तपस्या की, तब सदाशिवने मेरे तई उसको बकसीस दिया. फिर उस पापीने मुझे लेकर अपने पेटमें भर रक्खा. तबसे मैं मोहिनी कहलाई पर शिवकी आज्ञा थी कि इसकी सेवा कीजियो. और जो यह कहें सो मानियो. यों इसके बश होकर मैं रहतीहूं. मेरा माजरा जो था सो मैंने आपसे कहा. अब ये वीर मुझे काबू कर तुम्हारे पास लाये हैं. और आदमीको इतनी कुदरत नहीं थी बल्कि जो तुमभी बहुतेरा उपाय करते तोभी तुम्हारे हाथ न आती. अब राजा ! मैं तुम्हारे बशमें हूं और मैं मोहनी हूं इसवास्ते तेरे पास रहूंगी. ज्यो महादेवके पास पार्वती यह कहकर बचन दिया. एक वह मोहिनी और दूसरी वह रंडी, जिसे देवसे छुड़ाया था वे दोनों राजाके साथ हुईं. ये बातें कह पद्मावती पुतली
( ७६ ) सिंहासनबत्तीसी. बोली - सुन राजा भोज ! उस मोहनीसे राजा निक्रमादित्यने गांधवे विवाह किया. और जो कुछ आगे राजाके पराक्रम हैं सो मैं कहती हूं कान देकर सुन. वह रंडी दैत्यसे जो छुडायीथी उसे राजाने यों कहा-सुन सुंदरी ! मैं तुझे पूछताहूं कि, देवने तुझे कहां पाया था ? कौन द्वीप और कौन नगर तेरा ? और कौन बाप है तेरा ? नाम ले उसका, अपना सब ब्यौरा मुझसे कह और सब बातें तुर्त बताव ? अब देर मत कर सुनकर तेरी अवस्था जैसा तू कहेगी वैसाही मैं विचार करूंगा. वह नारी बोली-महाराज ! अब मेरी कथा सुनो, कि किस्मतका लिखा मिटता नहीं है और जो कुछ विधाताने कपालमें लिखा है वह इन्सानको भुगतना होता है. एक ब्रह्मपुरी है समुद्रके पास जिसे सिंहलद्वीप कहते हैं वहांके ब्राह्मणकी मैं बेटी हूं. एक दिन अपनी सखियोंके संग तालाबपर स्नान करनेको गई थी और वह तालाब ऐसा था कि, घने घने दरख्तोंसे सूर्य वहां नजर न आता था. वहां सखियोंके साथ मैं स्नान पूजा करके घरको आतीथी कि सामनेसे यह राक्षस नजर आया. और मुझे देखकर वहांही रति मांगने लगा ज्यों ज्यों मैं न मानती थी त्यों त्यों मुझे बहुत दुःख देता था. मैं अनब्याही अपना धर्म क्योंकर गँवाती ? कितनेक दिनोंसे मुझे सताताथा और नरकमें पडनेसे डरता न था. राजा ! अब तूने धर्म रखलिया, और
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ )
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ ) मेरे कुलकीभी लाज रक्खी तुझे संसारमें यश और कीर्ति होगी. जैसा तूने मुझपर उपकार किया, वैसाही मुझसे आशीष ले. हजार बरसतक जीता रह और किसीके वश न पड. दिन दिन तेरा सत और तेज बढते जायगा साहस तेरा ऐसा होवेगा कि तुझे कोई न जीते. इतनी आशीष जब वह दे चुकी तब उसे बेटी कह राजाने अपन पास तख्तपर बिठा लिया और मोहनीकोभी उठा बेतालको हुकुम किया कि, हमारे नगरको लेचलो. तब बेताल सबको लेकर उडे, पलक मारने महलमें ला दाखिल किया. राजाने आतेही दीवानको याद किया. वह मंत्री आकर हाजिर हुवा. राजाने कहा-कोई पंडित सुज्ञानी ब्राह्मण ढूंढकर ले आओ जलदी. प्रधानाने आज्ञा पाय नगर नगर ब्राह्मणोंको भेज एक ब्राह्मण सुंदर विद्वानको बुलाया. मार्कंडेय नाम वह ब्राह्मण जब आया, तब उसे ले मंत्रीने राज- सभामें लाया. राजाने उससे हाथ जोडकर कहा कि-महाराज ! एक ब्राह्मणकी कन्या हमारे यहां है, उससे हम तुमको दिया चाह- तेहैं. तुमभी यह बात कबूल करो. ब्राह्मण बोला-वह कन्या हमको दो और जगतमें तुम यश, धर्म और बडाई लो. राजाने यह बात सुनतेही ब्राह्मणको तिलक दे सादीके सामानका दान दहेज तैयार किया. फिर ब्राह्मण बुलाकर संकल्प कर उस कन्याका कन्यादान किया और उसको बहुत कुछ दिया.
इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर
( ७८ ) सिंहासनबत्तीसी. इतनी बात कहकर पुतली कहने लगी कि-सुन राजा ! वीर विक्रमादित्यने सोच कुछ न किया और लाखों रुपयोंका दान दहेज दे एक पलमें ब्राह्मणके हवाले किया. तू इस लायक नहीं है इस सिंहासनपर बैठनेसे डर. ऐ राजा भोज ! तू गुण- ग्राहक है, दानी और साहसी नहीं, नाहक हिर्स कर्ता है. यह सुनकर राजा भोज मनमे पछताकर चुप हो रहगया. दूसरे दिन सुबह होतेही फिर सिंहासनके पास आया और बैठनेको तैयार हुवा. जब उसने पांव बढाया तब कीर्तिवती- बारहवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा वीरविक्रमा- दित्य अपनी मजलिसमें बैठकर कहने लगा कि, कलि- युगमें औरभी कहीं कोई दाता है ? ऐसी बात सुनतेही एक ब्राह्मण बोला कि-सुन राजा ! प्रजाके हितकारी तेरे बराबर साहसी और दानी कोई नहीं. पर एक बात मैं कहना चाहताहूं शर्मसे कह नहीं सक्ता. राजाने कहा कि-सत्य बात कहनेमें लाज काहेकी है? तुम हमारे आगे साफ कहो ? हम उस बातको बुरा न मानेंगे वह ब्राह्मण बोला-एक राजा समुद्रके किनारे रहता है और सदा धर्मकार्य कर्ता है. जब वह सबेरे स्नान किया चाहता है तब लाख रुपये दान देता है और जल पीता है यह तो मैंने एक उसके दानकी रीत कही
बारहवीं पुतली १२. (७९)
बारहवीं पुतली १२. (७९)
औरभी बहुत कुछ दान करता है. और ऐसा राजा धर्मात्मा उसके सिवाय दूसरा हमने कहीं नहीं देखा यह बात सुनकर राजाके जीमें इच्छा हुई कि, उस राजाको चलकर देखिये. यों अपने जीमें विचार कर बैतालोंको बुला तख्तपर सवार हो समुद्रके किनारे चला और जो उसके नगरके पास पहुँचा, सिंहासनसे उतर बैतालोंको कहा कि-अब तुम देशको जाओ और हम इस राजाकी सेवा करनेपर तैयार हुए. तुम वहांसे हमारी खबर लेते रहियो तब बैताल बोला-इसका विचार क्या है? राजाने कहा-तुम्हें इस बातसे क्या काम है? जो हम तुम्हें कहते हैं सो करो. यह बात सुनकर बैताल अपने नगरको आये और राजा पाँओ पाँओसे शहरमें दाखिल हुआ. नगरमें फिरता हुआ राजाके द्वारपर जाकर पहुँचा. और द्वारपालसे कहा-अपने स्वामीको समाचार दो कि, कोई विदेशी तुम्हारी सेवा करनेके लिये खड़ा है. इसकी बात डेवढीदारोंने सुनकर राजासे अर्ज की. महाराज सुनतेही हंसता हुआ आपही बाहर निकल आया. राजाको देखकर विक्रमाने जुहार किया. तब उसने पूछा कि- क्षेम कुशलसे हो? तब विक्रम बोला कि-आपके दयासे. फिर राजाने कहा, तुम किस देशसे आये हो? और तुम्हारा नाम क्या है? और तुम्हारा अर्थ क्या है? सो सब सुनाओ यह बोला,-सुनो महाराज ! मेरा नाम विक्रम है. राजा वीर विक्रमादित्यके
देशके मैं रहनेवाला हूं कुछ वैराग्य मेरे जीमें हुआ इससे मैं आपके दर्शनको आयाहूं, अब आपका दर्शन मैंने किया इससे सब मेरा सोच विचार गया. राजा बोला-तुझे हम क्या रोज करदें, और कितनेमें तुम्हारा निर्वाह होगा ? तब इसने कहा- चार हजार रुपयेमें मेरी गुजरान् होगी. यह सुनकर राजाने कहा-ऐसा क्या काम करते हो जो चार हजार रुपये रोजीना हम तुझे देवें ? फिर विक्रम बोला-जो काम हमसे कहोगे हम वह करेंगे. जिस राजाके पास मैं रहता हूं उसको गाढ़ी भीड़िमें काम आता हूं और इस तरहसे चार हजार रुपये लेकर राजा वहां रहने लगा. यह बात पुतलीने समझा राजा भोजसे कही. जब इसी तरहसे नौदस दिन गुजर गये तब राजा वीरविक्रमादित्यने अपने मनमें विचारा कि, जो लाख रुपये रोज दान करता है उसका नित्यनेम क्या है, इसे मालूम किया चाहिए. किस देवताका इसे बल है ? इसी सोचमें रहने लगा. एक दिन क्या देखना है कि, दोपहर रातके समय राजा अकेला बनको जाता है यह देखतेही उसके पीछे होलिया. आगे आगे राजा और पीछे पीछे विक्रमादित्य इस तरहसे शहरके बाहर निकल एक बनमें पहुँचे. वहां जाकर देखा तो एक देवीको मंदिर है. और उस मंदिरके बाहर कहाड चढ़ा है और उसमें ब्रह्मकी आगसे घी औटता है वह राजा तालाबमें,
बारहवीं पुतली १२. (८१)
बारहवीं पुतली १२. (८१)
स्नान करके देवीका दर्शन कर उस कड़ाहमें कूद पड़ा और पडतेही भून गया. वहां चौसठ योगिनियां आनेके राजाके उस। तलेहुए बदनको नोचकर खागईं. इतनेमें कंकालिन अमृत ले आई और उसके हाड़पंजरपर छिड़का तब वह राजा 'राम- राम, करके उठकर खडा हुआ. तब देवीने मंदिरमेंसे लाख रुपये दिये और वह लेकर अपने घरको आया. तब योगिनियाभी अपने धामको गईं. यह तमाशा देखकर राजा विक्रमादित्यभी, उसी कड़ाहमें कूद पड़ा और उसी तरह जल गया. फिर तुर्त योगिनियां दौड़ीं और उसकोभी खागईं और उसी तरह कंकालिनने अमृत ला उसपरभी छिड़क जिला दिया. मंदिर- मेंसे उसेभी लाख रुपये देवीने दिये रुपये ले दुबार फिर वह कड़ाहमें गिरा. योगिनिया फिर जला भूना गोस्त बदनका नोचकर खागईं और कंकालिनने अमृत छिड़क जिलादिया. फिर देवीने लाख रुपये दिये. गरज वह इसी तौर सातबेर गिरा. और लाख लाख रुपये हर बेर पाया जब आठवीं दफह इरादः गिरनेका किया तब देवीने आकर उसका कर पकड़ा और कहा कि-मांग जो तुझे चाहिे ? तब राजा विक्रम हाथ जोड़कर बोला कि-मैं मांगू, जो मांगा पाऊं देवीने कहा-जो तेरी इच्छांमें आवे सो तू मांगले. मैं तुझे दूंगी. राजाने कहा- देवी ! जिस थैलीमेंसे तुमने रुपये दिये हैं, वह थैली मुझे ६
( ८२ ) सिंहासनबत्तीसी. कृपा कर दीजिये. यह सुनतेही उसने वह थैली दी वह खुश हो उसी राजाके स्थानपर गया और दूसरे दिन रातको फिर वह राजा बनमें गया और वहां उसने देखा कि न देवीका मंदिर है और न कड़ाह है. स्थान भंग पड़ा है. यह दशा वहांकी देख सोचमें डूब गया. फिर जो होश आया तो हाय मारके रोने लगा, आखिरको लाचार हो उलटा फिर अपने मंदिरको आया उदास होकर सोरहा भोर हुवा जो सभाके लोग आया और राजाको देखा कि, विह्वल पड़ा है. न हँसता है, न किसीसे बोलता है, बल्कि जो कोई राज्यकी बात करता है, यह सुन- कर मुँह फेर लेता है. यह हालत राजाकी देख दीवानने विनत किया कि-महाराज ! आपका मन मलीन होनेसे सारी सभा उदास होरही है. राजाने यह जवाब दिया कि- आज तुम बैठकर दरबारका काम करो; मेरा शरीर माँदा है. तब प्रधान बैठ राजकाजकी बातें करने लगा. और जो कोई आताथा सो अपने मनमें जो चाहताथा सोई विचारताथा. कोई कहता था कि, राजा बीमार हो गया है, कोई कहता कि, राजाको कोई मोह गया है. और कोई कहताथा कि, राजा है नहीं. पर जो इसकी अवस्था थी वो किसीको मालूम न थी, इतनेमें अपने समयपर राजा बीर विक्रमादित्यभी गया और पूंछा कि-तुम्हारे मनमें क्या दुःख है ? क्योंकि मैंने
[Header] बारह्वीं पुतली १२. ( ८३ )
[Header] बारह्वीं पुतली १२. ( ८३ )
तुमसे प्रतिज्ञा की थी कि, मैं तुम्हारी मुश्किलके वक्त काम आऊंगा. सो मेरा बचन क्या आप भूल गये ! मेरे आगे अपनी सब अवस्था ब्योरेवार कहिये. तब राजा बोला कि- मैं तेरे आगे क्या अपनी बात कहूँ ? पर एक मेरे जीमें है कि, अब अपना प्राणघात करूंगा. विक्रमने कहा-पृथ्वीनाथ ! एक बेर मेरे आगे अपने मनकी व्यथा कहिये और पीछे अपने मनमें जो करना होय सो करो. राजाने कहा-एक देवी मेरे पास थी सो मैं नहीं जानता वह कहां गई ? लाख रुपये रोज वह मुझे देतीथी. और वे लाख रुपये मैं नित्य दान पुण्य करताथा. और अब मुझे बड़ा कष्ट हुआ है मेरी नित्यक्रिया निबहेगी नहीं. इसवास्ते अब मैं जान दूंगा. और ऐसा मैं किसीको नहीं देखता कि जिससे मेरा नित्यनेम चले और जो धर्म पुण्य न रहेगा तो मेरा जीना संसारमें अकारण है. यह बात उसकी विक्रम सुनतेही बोला-ऐसा काम मैं करूंगा. ऐसा बोलकर वह थैली हाथमें दी. और कहा-महा- राज ! स्नान ध्यान कर नित्यधर्म कीजिये और थैलीसे जितने रुपये चाहोगे वे खर्च करोगे. कम कभी न होंगे. यह बात सुनतेही राजा खुश होकर उठ बैठा और थैली हाथमें ले प्रधानको बुला उसमेंसे रुपये निकाल प्रधानको दिये और खर्च करनेका हुक्म किया. और कहा कि-जितने ब्राह्मण
( ८४ ) सिंहासनबत्तीसी.
सदा दान पाते हैं उन्होंको उसी तरहसे दो. दीवान मुवाफिक हुकमके अपने काममें मशगूल हुआ. और राजा बीर विक्रमा- दित्यने कहा—महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं अपने देशको जाऊं. बहुत दिन गुजरे हैं तब वह राजा बोला-हम तुम्हारे कहांलक गुण मानेंगे ? तुमने हमें जीवदान दिया है. फिर कहा—जो तुम अपने देश पहुँचोगे. तब संदेसा हमें भेज देना कि, हम क्षेम कुशलसे पहुँचे. और ठीक अपना ठिकाना बता जाओ, जो हमारा पत्र तुम्हारे पास पहुँचे. तब उसने कहा कि-हे राजा ! मैं राजा बीर विक्रमादित्य हूं,अंबा वती नगरीमें राज्य करता हूं. तुम्हारा नाम और यश सुनकर दर्शनके लिये आयाथा. सो तुम्हें देखा और मेरा चित्त प्रसन्न हुआ. तुम अच्छी तरहसे राज करो और हमें विदा दो. तुम्हारा साहस बल धर्म हमने देखा. यह सुनतेही वह राजा उसके पाँओंपर गिरपड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा कि— महाराज ! बड़ा अपराध हुआ . मैंने तुम्हारा मर्म न जाना. तुमने मेरी सेवा की सो तुम अपने जीमें कुछ न लाना. और जैसा धर्म मैंने आपका सुनाथा वैसा ही देखा. और धन्य हैं तुम्हारे तांई और तुम्हारे धर्म साहस और पराक्रमको. यह कह राजाको तिलक दे विदा किया. राजा बीरोंको—बुला सवार हो अपने नगरमें आया. इतनी बात कीर्तिवती पुतली
कहकर राजा भोजको समझाने लगी कि-सुन राजा भोज राजा बीर विक्रमादित्यका साहस ! ऐसी वस्तु पाकर देते कुछ बिलंब न लाया और अपने जीमें न पछताया. और जैसा साहस राजाने किया वैसा सुनकर कोई न करता; किस गिनतीमें है ? यह बात सुन राजा भोज चुप हो रहा पुनि दूसरे दिनके प्रभात समयमें राजा उठ, तैयार हो, सिंहासन पर बैठनेको गया. और मनमें इरादः बैठनेका करताथा फिर झिझक कर रह जाताथा इतनेमे त्रिलोचनी -
तेरहवीं पुतली-
बोल उठी-सुन राजा भोज ! एक पुरातन कथा मैं तुँ सुनाऊँ कि, इस सिंहासनपर वही चढ़ेगा, जो राजा वि क्रमके समान पराक्रम करेगा. तब राजाने कहा-कह सुंदरी ! बिक्रमका बल और कथा सुननेको मेराभी म चाहता है. पुतली बोली-राजा ! कान देके सुन' एक दिन राज बीर विक्रमादित्य शिकार खेलनेको चला. और साथमें जित मुसाहिब रजपूत बली थे वेभी सजकर तैयार हो आये और ए एककी सवारीमें हजार हजार कोसके धावेका तुरंग था. राजा अप घोड़ेपर सवार था. और बह गोया छलावा था. राजकुमार अपने शिकारी जानवर बाज, बहरी, जुर्रा, शाहीन, कूही, करगा भँगवा भँगवा अपने अपने हाथोंपर ले ले साथ हुए अ
( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी. राजानेभी एक बाज अपने हाथपर बिठा लिया. मीरशिकारोंके हुक्म पहुँचा कि, जिस जिसके पास जो जो शिकारी जानवर तैयार हैं सो लेकर रिकाबमें हाजिर होवें. इस तरह बन उसने एक बनकी राहली और वहां जाकर किसीने बाज और किसीने बहरी और किसीने कुही, किसीने शाईन उड़ाई और अपने अपने जानवरोंके पीछे घोड़े बढ़ाये. और उधर राजा- नेभी जितने मीर शिकार थे उन्हें हुक्म किया कि, इस जंगलमे सब शिकार करो, मैं तमाशा देखूंगा. जो शिकार कर लावेगा वह इनाम पावेगा. और जो शिकार न कर लावेगा सो नौक- रीसे दूर होवेगा. यह बात सुनतेही जितने मीरशिकार थे उन सबोंने उस बनमें चारों तरफ जानवर छोड़े और उधर हुकुम बहेलियोंको किया कि, तुमभी शिकार करो. इस तरह सब शिकार करते थे और लालाके राजाको गुजराते थे वह खडा तमाशा देख रहथा. फिर उसने एक मरिंदापर बाज उड़ाया और आप उसके पीछे लगा. जिधर जिधर वह बाज जाताथा राजाभी पीछा किये जाताथा. इसमें कोसों निकल गया. देखो तो शाम होगई तब याद आई और फिरकर पीछे देखा तो वहां कोई आदमी नज़र न आया. और वह तमाम फौज राजाकी शाम हुएपर राजाको ढूँढ़ शिकार लेले आनकर नगरमें दाखिल हुई और वहां सूने जंगलमें राजा भटकता फिरता था. कहीं रहा
तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )
तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )
था, जब अँधेरा होगया और रात बहुत होगई तब एक किनारेपर जा पहुँचा, यहां उतरकर अपने हाथ जीन- डा घोड़ेको एक झाड़ीसे बांधकर बैठ रहा, फिर देखता क्या है कि,वह नदी बढ़ती आती है, और यह हटने लगा, गरज ज्यों ज्यों राजा हटता जाताथा त्यों त्यों बह बढ़ती जा- तीथी, फिर जो निगाह की तो यह देखा कि, नदीकी बीच धारमें एक मुर्दा बहा चला आता है, और उसके साथ एक बैताल और एक योगी खैंचा खैंची किये हुए आते हैं, और आपसमें झगडते हैं, योगी बैतालसे कहता है कि-तुने बहुतसे मुर्दे खाये हैं और यह मैंने अपने अवसरपर पाया है तू छोड़दे मैं उसे लेजाकर अपना योग कमाऊंगा, यह सिद्धि मैंने तुझसे पाई, यह सुन बैताल बोला-भाई ! मैं आयाना नहीं हूं, जो तू मुझे फुसलावे, क्योंकर मैं अपना आहार तुझे दूं ? इसी तरह दोनों आपसमें झगडतेथे और कहतेथे, कि, कोई तीसरा पुरुष इस बखत ऐसा नहीं कि, हमारा न्याय चुकावे, फिर योगी कहने लगा कि- बैताल ! तू मेरी बात सुन कल प्रभातको हम तुम सभाको जावें और जो सभामें न्याय चुके वही तूभी प्रमाणभी कर और मैं भी करूंगा, इतनेमें एककी दृष्टि राजाकी ओर जा पडी, देखकर दोनों हँसे और कहने लगे कि-वह कोई मनुष्य नदीके किना- रेमें नजर आता है, वहां चलो कि, वह अपना न्याय निबडेगा,