भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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बारहवीं पुतली १२. (८१)

स्नान करके देवीका दर्शन कर उस कड़ाहमें कूद पड़ा और पडतेही भून गया. वहां चौसठ योगिनियां आनेके राजाके उस। तलेहुए बदनको नोचकर खागईं. इतनेमें कंकालिन अमृत ले आई और उसके हाड़पंजरपर छिड़का तब वह राजा 'राम- राम, करके उठकर खडा हुआ. तब देवीने मंदिरमेंसे लाख रुपये दिये और वह लेकर अपने घरको आया. तब योगिनियाभी अपने धामको गईं. यह तमाशा देखकर राजा विक्रमादित्यभी, उसी कड़ाहमें कूद पड़ा और उसी तरह जल गया. फिर तुर्त योगिनियां दौड़ीं और उसकोभी खागईं और उसी तरह कंकालिनने अमृत ला उसपरभी छिड़क जिला दिया. मंदिर- मेंसे उसेभी लाख रुपये देवीने दिये रुपये ले दुबार फिर वह कड़ाहमें गिरा. योगिनिया फिर जला भूना गोस्त बदनका नोचकर खागईं और कंकालिनने अमृत छिड़क जिलादिया. फिर देवीने लाख रुपये दिये. गरज वह इसी तौर सातबेर गिरा. और लाख लाख रुपये हर बेर पाया जब आठवीं दफह इरादः गिरनेका किया तब देवीने आकर उसका कर पकड़ा और कहा कि-मांग जो तुझे चाहिे ? तब राजा विक्रम हाथ जोड़कर बोला कि-मैं मांगू, जो मांगा पाऊं देवीने कहा-जो तेरी इच्छांमें आवे सो तू मांगले. मैं तुझे दूंगी. राजाने कहा- देवी ! जिस थैलीमेंसे तुमने रुपये दिये हैं, वह थैली मुझे ६